Temple Uttarakhand

कसार देवी मंदिर, अल्मोड़ा | Kasar Devi Temple

कसार देवी मंदिर

उत्तराखण्ड जो आदिकाल से हिन्दू संस्कृतियों की सबसे पुरानी तपस्थली है। यहाँ बहुत से ऐसे मंदिर हैं जिसकी मान्यताएँ पौराणिक काल से चली आ रही है। और बहुत से ऐसे मंदिर हैं जिनके बस दर्शन मात्र को दूर-दूर से भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। ऐसा ही एक मंदिर है अल्मोड़ा का कसार देवी मंदिर

कसार देवी मंदिर की विशेषताएँ कुछ ऐसी हैं जिसके रहस्य नासा के वैज्ञानिक तक जानना चाहते हैं। आखिर क्या है इसके पीछे का कारण पढ़िए इस पूरे ब्लॉग को ।

 


कसार देवी मंदिर । Kasar Devi Temple

 

उत्तराखण्ड राज्य में अल्मोड़ा के निकट कसार एक गाँव है। जिसका नाम अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित काषय (कश्यप) पर्वत की चोटी पर स्थित कसार देवी के नाम से सुप्रसिद्ध हो गया है। चारों और से वृक्षों और उनकी छाया से आच्छादित कसार देवी के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण दूसरी शताब्दी में किया गया था।

कसार देवी मंदिर का निर्माण काषय पर्वत की चोटी पर एक प्रस्तर शिला पर गुफानुमा संरचना के रुप में किया गया है। जहाँ पहुंचने के लिए सैकड़ों सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। कसार देवी मंदिर में माँ दुर्गा के देवी रुप कात्यायनी की पूजा अरचना की जाती है।
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पौराणिक कथा एंव मान्यताएँ

 

पौराणिक कथा के अनुसार माँ कात्यायनी का जन्म भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश के तेज से हुआ था। एक कथा यह भी है कि महिषासुर नामक राक्षस के प्रकोप को खत्म करने के लिए देवी ने कात्यायन ऋषि के घर अश्र्विन कृष्ण चतुर्दशी को देवी रुप में जन्म लिया। जहाँ कात्यायन ऋषि ने देवी की तीन दिनों (नवमी) तक पूजा की और दशमी को इन्होंने महिषासुर नामक असुर का वध कर दिया। कात्यायन ऋषि के देवी की सर्वप्रथम पूजा अर्चना के कारण इन्हें कात्यायनी भी कहते हैं। इस रुप में देवी सिंह पर सवार रहती हैं और एक हाथ में कमल व दूसरे गाथ में तलवार धारण करती हैं।

कथानुसार जब देवी द्वारा महिषासुर का वध किया गया तो शुम्भ- निशुम्भ नाम के दो राक्षसों ने देवी को युद्ध में ललकारा और हारने पर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा जिसपर देवी राजी हो गई। मगर शुम्भ-निशुम्भ की यह इच्छा तब खत्म हो गई जब दोनों का देवी कात्यायनी ने वध कर दिया।

कहते हैं कि कात्यायनी रुप में देवी सबसे पहले अल्मोड़ा के कसार देवी मंदिर में ही प्रकट हुई थी। इसलिए इस मंदिर में नवदुर्गा के छठवें रुप कात्यायनी देवी की “कसार देवी मंदिर” में पूजा की जाती है। यहाँ आने वाले को ना सिर्फ प्रकृति की खूबसूरती देखने को मिलती है बल्कि मानसिक शाँती की भी अनुभूति होती है।

लोगों के अनुसार इस मंदिर में आने वाले की झोली कसार देवी हमेशा से भरती आई है। यदि कोई सच्ची आस्था और विश्वास के साथ देवी की पूजा अर्चना नहीं करता है तो उसे देवी की ये मूर्ति पत्थर समान लगती है।




वैज्ञानिक कर रहे इस मंदिर की खोज

 

ये सुनकर हैरानी होगी मगर अल्मोड़ा में स्थित कसार देवी मंदिर के रहस्यों की खोज में वैज्ञानिक तक कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस मंदिर के नीचे एक विशाल भू-चुंबकीय पिंड है जिसके कारण यहाँ आने वालों को अद्भुत शाँति की अनुभूति होती है। वैज्ञानिकों द्वारा इस मंदिर के आसपास के क्षेत्रों को वैन एलन बेल्ट कहा गया है। यानि पृथ्वी का वह क्षेत्र जहाँ से उतपन्न चुंबकीय आवरण पृथ्वी को सूर्य से आने वाली ऊर्जावान चार्ज कणों द्वारा बचाता रहता रहता है।

वैन एलन बेल्ट की खोज के बारे में वैज्ञानिकों द्वारा अभी भी खोज की जा रही है। उदाहरण के तौर पर वैन एलन बेल्ट को आसान शब्दों में ओजोन परत द्वारा सूर्य से आने वाली रेडियोएक्टिव किरणों से ओजोन परत द्वारा रक्षा के रुप में समझ सकते हैं। कसार देवी मंदिर के अलावा वैन एलन बेल्ट अमेरिका के पेरु स्थित माचू-पिच्चू व इंग्लैंड के स्टोन हेंग में भी पाई गई हैं।

 


स्वामी विवेकानन्द का कसार देवी का संबंध

 

कसार देवी मंदिर में स्वामी विवेकानन्द ने उत्तराखण्ड यात्रा के दौरान 1890 में योग साधना की थी। उन्होंने इस क्षेत्र में कुछ महीने बिताए थे। इसके अलावा यह क्रैंक रिज के लिए भी प्रसिद्ध है जहाँ 1960-70 के दशक में “हिप्पी आंदोलन” के लिए प्रसिद्ध था। इसके अलावा बौद्ध गुरु “लामा अन्ग्रिका गोविंदा” ने भी इस स्थान पर रहकर विशेष साधना की थी।





 कसार देवी कैसे पहुंचे । How To Reach Kasar Devi Temple

 

इस मंदिर में पहुंचने के लिए पहले आपको उत्तराखण्ड के कुमाऊँ जिले अल्मोड़ा आना होगा। जहाँ से लाला बाजार अल्मोड़ा से 9 किमी दूर तराई नागरी गाँव पहुंचना होगा। कसार देवी का मंदिर तराई नागरी गाँव से महज 5 किमी की दूरी पर स्थित है।

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Deepak Bisht

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