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प्रीतम भरतवाण : उत्तराखंड के जागर सम्राट | Preetam Bhartwan

प्रीतम भरतवाण
नाम    प्रीतम भरतवाण
जन्म तिथी12 अगस्त 1949
जन्म स्थान सिला गांव, देहरादून, उत्तराखंड
सम्मान  पद्मश्री (वर्ष 2019)
उपनाम जागर सम्राट 

 

 जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण | Preetam Bhartwan

प्रीतम‌‌ भरतवाण को उत्तराखंडी लोकगायन की विधा जागर का सम्राट कहा जाता है। उन्होंने बरसों से चली आ रही इस लोकगायन विधा को देश और विदेश में एक विशिष्ट पहचान दिलाने में एक अहम योगदान दिया है। यही कारण है उन्हें जागर सम्राट का उपनाम मिला है। प्रीतम भरतवाण जिन्हें सब घर में प्यार से  प्रीति नाम से बुलाते थे, उन्होंने  6 साल की  ही उम्र में उत्तराखंडी संगीत के अहम वाद्ययंत्र डौंर थाली की तान पर गाना गाने का प्रयास करते थे। वह न सिर्फ जागर, लोकगीत, पवांडा और घुयांल गाते हैं बल्कि उन्हें उत्तराखंडी वाद्य यंत्र  ढोल, दमाऊ, हुड़का और डौंर थकुली बजाने में भी महारत हासिल है।

डौर थाली गढ़वाल का दूसरा प्रमुख वाद्य है। डौर (डमरू) शिव का वाद्य है। वादक ढोल की तरह डमरू को लाकड़ और हाथ से बजाता है। घुटनों के बीच डमरू को रखकर डौरिया डमरू बजाने वाला दाहिने हाथ से डौर पर शब्द करता है और बायें हाथ से शब्दोत्पत्ति में उंगलियों का संचार कर आवश्यक देवताओं की तालों की उत्पत्ति करता है। वहीँ उत्तराखंडी संगीत की विधा – जागर का सम्बन्ध भूत एवं प्रेतात्माओं की पूजा में है तथा कभी-2 ये लोकगीत लोक नृत्यों के साथ मिश्रित रूप में गाये जाते हैं। कभी-2 जागर विभिन्न देवी देवताओं के सम्मान में पूजा लोक गीतों के स्वरुप में भी गाये जाते हैं।

प्रीतम भरतवाण का जन्म एवं स्कूली शिक्षा

प्रीतम भरतवाण 12 अगस्त 1949 को  देहरादून के रायपुर ब्लॉक में सिला गांव में पैदा हुए। अपने बचपन के बारे में खुद वह कहते हैं कि औजी परिवार में पैदा होने के कारण संगीत उन्हें विरासत में मिली है।  सयुक्त परिवार में पले बढ़े प्रीतम बचपन में अपने पिताजी और चाची के साथ गांव में किसी खास पर्व या फिर खास दिनों में जागर लगाने जाया करते थे और वहीं उनकी ट्रेनिंग भी हुई। प्रीतम को एक बार स्कूल में रामी बौराणी के नाटक में बाल आवाज देने का मौका मिला, उस समय वह तीसरी क्लास में पढ़ते थे।

फिर मसूरी में उन्होंने एक नृत्य-नाटक में डांस किया जिसके बाद प्रीतम स्कूल प्रिंसिपल की नजरों में आ गए और उन्हें स्कूल के हर प्रोगाम में गाने का मौका मिलने लगा।
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ऐसे हुई शुरुआत

प्रीतम ने लोगों के सामने पहली बार 12 साल की उम्र में जागर यानी पवांडा गाया। वे बताते हैं कि मैं चाचाजी और घर के मर्दों के साथ शादी-बरातों में जाया करता था। जहां पर मेरे चाचाजी और पिताजी रात भर जागर गाते थे। एक दिन राज को 3 बजे के बाद चाचाजी ने बोला कि आज मैं थक गया हूं और अब आगे का जागर प्रीतम सनुाएंगे। बस उसी दिन से मेरी पहली पब्लिक परफॉर्मेंस की शुरुआत हुई।

सुरीली मेरु जिया लगीगे ..गाने ने दिलाई पहचान

1988 में प्रीतम ने ऑल इंडिया रेडियो के जरिए लोगों को अपना टैलेंट दिखाया। वहीं प्रीतम को पहली बार तौंसा बौ से लोकप्रियता मिली । 1995 में यह कैसेट निकली जिसे रामा कैसेट ने रिकॉर्ड किया था। यही नहीं सबसे ज्यादा पॉपुलैरिटी उन्हें “सुरुली मेरू जिया लगीगे” से मिली। पैंछि माया, सुबेर, रौंस, तुम्हारी खुद, बांद अमरावती जैसी सुपरहिट एलबम देने वाले प्रीतम अब तक 50 से अधिक एल्बम व 350 से अधिक गीत गा चुके हैं।
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इसके अलावा वह विदेशों में भी अपनी इसी प्रतिभा के लिए बुलाए जाते हैं। अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, जर्मनी, मस्कट, ओमान, दुबई समेत कई अन्य स्थानों पर वह मंचों पर वे अपनी लाइव प्रस्तुति दे चुके हैं।

सम्मान-

प्रीतम भरतवाण को उनकी आवाज और टैलेंट के लिए कई अवॉर्ड भी मिल चुके हैं। जिनमें उत्तराखंड विभूषण, भागीरथी पुत्र, जागर सिरोमणि, सुर सम्राट, हिमालय रत्न, जैसे कई सम्मान और उपाधियों से सम्मलित है। यही नहीं जागर को दुनिया भर में पहचान दिलाने  के लिए प्रीतम भरतवाण को वर्ष 2019 में भारत के सर्वोच्च सम्मानों में से एक पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

 




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Deepak Bisht

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