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धार्मिक और समाजिक सुधार आंदोलनों का भारत की आज़ादी में योगदान – दीपक बिष्ट

धार्मिक और समाजिक सुधार आंदोलनों का भारत की आज़ादी में योगदान

किसी भी राष्ट्र का विकास तभी संभव है जब हम रूढ़िवादी दकियानुसी विचारों और सामजिक भेदभाव को पीछे छोड़ नई सोच के साथ आगे बढ़ते हैं। समाज के हर तबके, हर वर्ग, हर जाति को साथ लेकर उनकी ऊर्जा को सृजात्मक और कल्याणकारी कार्यों में लगाते हैं। वर्तमान समय में हम सवाल तो बहुत करते हैं कि आखिर अंग्रजों, मुगलों और बाहरी आताताईयों ने हम पर इतने साल राज कैसे किया? आखिर क्यों इतना बड़ा देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा?

इन तमाम सवालों के साथ हम यह तर्क देना भी नहीं भूलते कि भारत को आजादी तभी मिल जाती अगर 1857 में मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे का साथ देते या फिर भगत सिंह, राजगुरू या चंद्रशेखर आजाद की भाँति हाथ में पिस्तौल उठाते। मगर इस आजादी की लड़ाई में सबसे बड़ा योगदान किसका था? क्या वह हिन्दू संघ था जिसने इस एकसूत्रता में इस देश को बाँधे रखा? क्या मुस्लिम लीग या कांग्रेस थी जिसने इस काम का सूत्रपात किया? इन तमाम सवालों के बाद भी हम इन्हीं झूठ से हमेशा सताए गए हैं मगर कभी हमने आजादी नींव के उस मजबूत आधारभूत शिला को जाना ही नहीं।

“हिन्दू धर्म को विकृत करने वाले अंधविश्वासों का उसके हुक्म की शुद्ध आत्मा से कोई लेना देना नहीं है । – राजा राम मोहन राय”

ये विचार भारतीय पुनर्जागरण के जनक राजा राम मोहन राय के हैं। जिन्होंने सर्वप्रथम भारत में सामाजिक व धार्मिक सुधार की वकालत की। उन्होंने उपनिषदों का अनुवाद आत्म सभा नामक एज संघ का गठन करके अंग्रेजी हिंदी और बंगाली में किया। ब्रह्म समाज का गठन मिशनरियों के भारतीयों को ईसाई धर्म में प्रवृत्ति करने के बाद हुआ। चूंकि राजाराम मोहन राय समझ गए थे कि जब तक हिन्दू धर्म में महिलाओं व अन्य जाति वर्गों समान दृष्टि से ना देखा गया तो संस्कृति, समाज व देश का ह्रास निश्चित है। राजाराम मोहन राय की मृत्यु के बाद ब्रह्मसमाज का नेतृत्व देवेन्द्र नाथ टैगोर ने संभाला।

ऐसा नहीं है कि राजा राम मोहन राय से पहले धार्मिक व सामाजिक रूढ़िवादिता पर प्रहार नहीं किया गया। इससे पहले भी कबीर, रहीम, मीरा आदि ने इन व्यवस्थाओं पर कुठाराघात किया मगर उस समय किसी ने इसे आंदोलन रूप नहीं दिया। राजा राम मोहन राय के पुनर्विवाह, विधवा विवाह और सती प्रथा के खिलाफ जो बात कही गई उससे सामाजिक और धार्मिक जागरण को बल मिला। जाति प्रथा जैसी कुप्रथाओं को बंद करके उन्होंने समाज में रहने वाले हर परिवार से इस पुनर्जागरण की शुरुआत की।

राजाराम मोहन राय के बाद प्रार्थना समाज के हिंदूवादी सुधारक केशव चन्द्र सेन ने हिन्दू वादी पंथों को खारिज किया और जाति को अस्वीकार किया। वहीं विद्वान ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह आन्दोलन का नेतृत्व करके सामाजिक सुधार को राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्व दिया। ये आन्दोलन इतना महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने समाज के अन्य सुधार आन्दोलनों को प्रेरणा दी।

मगर इसी बीच आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती द्वारा सबसे ज़्यादा हिन्दूवादी अंधविश्वासों पर गहरा घात किया गया। उन्होंने संस्कार से जुड़े कर मां को ब्राह्मणों के धार्मिक व्यवहार का विरोध किया और मूल वैदिक धर्म जो 4 वेदों पर निहित था उसी को स्वीकार करने को कहा गया। कहते हैं कि उन्हीं से भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में काफी प्रभाव देखने को मिला।

स्वामी विवेकानन्द ने तो रामकृष्ण निशन, वेदान्त सोसाइटी की नींव रख कर। विश्व धार्मिक मंच पर हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व करके सामाजिक सुधार में अपना अहम योगदान दिया। उन्होंने विश्व मंच पर भारत के हर तबके, हर वर्ग, हर धर्म को भारत की पहचान बताकार विश्व को चेताया कि भारत अब वो देश नहीं रहा जिसे गुलामी में जकड़ा जा सकता है।

18 व 19 वीं सदी के इस दौरान सबसे ज़्यादा हुए सामाजिक और धार्मिक सुधार आन्दोलनों में बंकिमचन्द्र चटर्जी, बाल गंगाधर तिलक, स्वामी विवेकानन्द और फिर युग पुरुष महात्मा गांधी ने भी अपने वचनों और प्रयासों से समाज को स्थिर करने का काम किया। यही वजह है कि भारत राष्ट्रवादी आन्दोलनों में इतने बढ़ चढ़ कर सामने आया।

सामाजिक सुधार की इन आन्दोलनों द्वारा हर कोने हर गाँव से किसी न किसी रूढ़िवादी और दकियानूसी ख्यालों पर कुठाराघात होने लगा। उत्तराखंड में भी इसी तरह के आन्दोलन की शुरुआत हुई जैसे डोला पालकी आन्दोलन और नायक सुधार आन्दोलन। इन सभी सामाजिक व धार्मिक आन्दोलनों से समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया गया।

भारत में जन्में इन महापुरषों – राजा राम मोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी आदि इन महान विचारकों की दूरदृष्टि ही है कि भारत समाज के हर तबके, हर जाति, हर वर्ग को एक सूत्र में बाँधकर राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत कर सका। अगर ये सब न किया गया होता तो भारत आज भी गुलामी की जंजीरों से जकड़ा होता। इस राष्ट्रीयता की भावना को जगाने में न संघ का हाथ है, न कांग्रेस का और न ही मुस्लिम लीग का बल्कि कुछ समाज में जन्मे दिव्य पुरूषों की अहम छाप थी जिसने समाज का सूत्रपात किया।

इन सभी महापुरुषों ने समाज के हर वर्ग और धर्म को एक बताकर मिल जुलकर चलने की बात कही। मगर अफसोस है कि जैसे उस समय सत्ता की लालच ने इस महान उद्देश्य को पूरा नहीं होने दिया। वहीं आजादी के बाद भी इसी तरह की मानसिकता ने समाज को बाँटे रखा।

कोई कहता है भीमराव अंबेडकर महान है उन्होंने समाजिक सुधार में अहम योगदान दिया। अंबेडकर और गाँधी के बीच वैचारिक मतभेद भी किसी से छुपा नहीं है। अम्बेडकर ने भारतीय संविधान में पिछड़ों व अछूतों को बराबरी देने के लिए क़ानून व्यवस्थाएं कि मगर जब 1956 में अंबेडकर ने पिछड़े वर्ग व अछूतों को एक कर बौद्ध धर्म को स्वीकार किया, वो भी आजादी के बाद तो वह किस तरह से हिन्दू धर्म में सामाजिक सुधार लगता है?

अम्बेडकर ही थे जिन्होंने 13 अक्टूबर सन् ने 1935 को येओल में कहा था। –

“मैं हिन्दू के रूप में पैदा हुआ हूं लेकिन हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं कम से कम ये तो मेरे वश में है।”

आज पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जनजाति या हिन्दू धर्म के अन्दर ही कई वर्ग और संगठन तैयार हो चुके हैं। हिन्दू वाहिनी, करणी सेना, भीम आर्मी जैसे संगठन भारत में सभी वर्गों के सूत्रपात की बात नहीं करते। बल्कि वे उसी कट्टरता की भावना को दोहराते हैं जिसे लेकर कभी अंग्रेज मशीनरी व मुस्लमान भारत आए थे।

अंत में मैं इन सब पर राजाराम मोहन राय की एक बात का उद्धरण (quote) करते हुए अपने इस ब्लाॅग का अंत करता हूँ जो मुझे लगता है वर्तमान समाजिक व धार्मिक स्थितियों पर जरूर विचार किया जाना चाहिए।

“जरा सोचिये कि आपकी मृत्यु का दिन कितना भयानक होगा, दूसरे बोलते रहेंगे और आप वापस बहस करने में सक्षम नहीं होंगे।”

 

डिस्क्लेमर – ये लेखक के निजी विचार हैं।


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About the author

Deepak Bisht

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