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अलनीनो क्या है ? | भारत पर अलनीनो का क्या असर पड़ता है ?

अलनीनो | El Neeno 

अलनीनो (El Neeno) एक स्पेनिश नाम है जिसका अर्थ “लिटिल बॉय

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” है। यह एक गर्म जल धरा है जो प्रशांत महासागर के उत्तर में भू-मध्य रेखीय क्षेत्र में बनती है। यह परिघटना 10 साल में 2 या 3 बार उत्पन्न होती है। जिससे प्रशांत महासागर का निम्न वायु दाब केंद्र आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट से खिसकर दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर पहुंच जाता है। अलनीनो परिघटना को सबसे पहले दक्षिण अमेरिका के मछुवारों ने 1800 में पाया था। उन्होंने इस दौरान समुद्र का पानी सामान्य दिनों से अधिक गर्म पाया। अलनीनो की परिघटना पेरू और इक्वाडोर के तटों पर दिसम्बर या क्रिसमस के समय देखने को मिलती है। हालाँकि यह परिघटना 10 सालों में दो या तीन बार देखने को मिलती है मगर इससे विश्व के मौसम पर विषम प्रभाव पड़ता है। 

अलनीनो का विश्व पर प्रभाव 

अलनीनो (El Neeno) के कारण प्रशांत महासागर के ठन्डे जल में आने वाले उभार में कमी आती है। जिससे समुद्र का जल समान्य से अधिक गर्म और जलीय पोषक तत्वों का अभाव देखने को मिलता है। इस परिघटना से मछुवारों पर बहुत प्रभाव पड़ता है क्यूंकि इस दौरान समुद्र में मछलियों की कमी देखने को मिलती है। अलनीनो के कारण  विश्व के मौसम पर भी दुष्प्रभाव देखने को मिलता है। इस दौरान अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा तथा न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा देखने को मिलती है।
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अलनीनो के कारण दक्षिण अमेरिका के तटवर्ती क्षेत्रों में भीषण वर्धा होती है कहीं-कहीं बाढ़ का प्रकोप भी देखने को मिलता है। वहीं अलनीनो के कारण उत्तरी अमेरिका और कनाडा में शुष्क मौसम देखने को मिलता है। न्यून व कम वर्षा के कारण खेती पर भी असर पड़ता है। हालाँकि इस दौरान अटलांटिक महासागर में आने वाले तूफानों में कमी आ जाती है। 

अलनीनो का भारत पर असर 

अलनीनो (El Neeno) की परिघटना का असर भारत के मौसम पर भी पड़ता है। चूँकि भारत की कृषि मानसून पर निर्भर करती है अतः इस दौरान मानसून कमजोर रहता है। जिससे भारत में कम वर्षा या सूखे का असर देखने को मिलता है। ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में भी अलनीनो के कारण सूखे की घटना देखने को मिलती है। हालाँकि अलनीनो की बजाय लानीना से भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के लिए फायदेमंद होता है।

पूर्व की अल नीनो घटनाएँ:

  • वर्ष 1982-83 एवं वर्ष 1997-98 की अल नीनो घटनाएँ 20वीं शताब्दी की सबसे प्रबल अल नीनो घटनाएँ थीं।
  • वर्ष 1982-83 की अल नीनो घटना के दौरान पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत में समुद्र सतह का तापमान सामान्य से 9-18 डिग्री सेल्सियस अधिक था।
  • वर्ष 1997-98 की अल नीनो घटना प्रथम अल-नीनो घटना थी जिसकी शुरु से लेकर अंत तक वैज्ञानिक निगरानी की गई थी।
  • वर्ष 1997-98 की अल नीनो घटना ने जहाँ इंडोनेशिया, मलेशिया एवं फिलीपींस में सूखे की स्थिति उत्पन्न कर दी वहीं पेरू एवं कैलिफोर्निया में भारी बारिश एवं गंभीर बाढ़ की घटनाएँ देखी गईं।
  • मध्य पश्चिम में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी दर्ज की गई, उस अवधि को “शीत विहीन वर्ष” के रूप में जाना जाता है।

 

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Deepak Bisht

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