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“आवाज भी एक जगह है” जैसे “पहाड़ पर लालटेन” – अलविदा मंगलेश डबराल

कुछ लोग साहित्य में इतने रच बस जाते हैं जैसे मनो अपने सृजन का रास्ता  लिख रहे हों , खुद तय कर रहे हों कि क्या जरूरी था क्या नहीं और मार्मिकता के किस ओर  ध्यान देना चाहिए था जो हमने दिया नहीं। ये वे लोग हैं जो दुनिया के सच पर बंद किये दरवाजे के पीछे से एक छोटे महीन छेद से इन्ही सच पर निगाह बनाये रखते हैं। ये साहित्य के जरिये जिंदगी को झांकने वाले तमाम लोग एक उलझी पहेलियों से होते हैं। जिन्हे पढ़ना तो सरल लगता है मगर उनके अंदर छुपे भावों को पढ़ना बेहद मुश्किल।  उन्हीं सरल मगर मुश्किल भावार्थ वाली पहेलियों से थे मंगलेश डबराल

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दूर एक लालटेन जलती है पहाड़ पर
एक तेज़ आँख की तरह
टिमटिमाती, धीरे-धीरे आग बनती हुई
देखो अपने गिरवी रखे हुए खेत
बिलखती स्त्रियों के उतारे हुए गहने
देखो भूख से, बाढ़ से, महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आए हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ़ झाड़ कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएं दांत पैने कर रही हैं
पत्थरों पर.

वर्ष 16 मई 1948 को टिहरी-उतरकाशी की सीमा पर बसे, काफलपानी गाँव में जन्मे मंगलेश डबराल ने जब पहाड़ पर  लालटेन के माध्यम अपने अंदर पनपी कविताओं का प्रकाशन किया तो लोग उन्हें पाहड़ का लालटेन कहने लगे। लेकिन उनकी कविताओं में जो भावों का सम्मिश्रण था।  उससे लगता था इस इंसान ने जितना पहाड़ों और जिंदिगियो को समझा उतना कोई न समझ सका। महादेवी वर्मा के काल में जन्मे इस कवि ने अपने शब्दों के सरल पर पैनी धार ने किसी को नहीं छोड़ा। उनकी कविता एक संस्मरण मैं याद करता हूँ तो बस भाव याद आते हैं। उनकी कविता में जिक्र था लालटेन पर लगी कालिख का जो रौशनी को सोख लेती है। ये कालिख थी शोषित समाज की, पहाड़ों के संघर्ष की और सत्ता की जालसाजी की। उसी सच से रूबरू होकर जब हम इसके भावों को आत्मसात करते हैं तो इन तमाम सालों में  बस पहाड़ के इस लालटेन को समूह ग की परीक्षाओं में याद किया गया मगर असल जिंदगी में हम भूलते चले गए।

वर्ष 2000 में मंगलेश डबराल को  साहित्य अकादमी पुरुस्कार से नवाजा गया। यह पुरुस्कार उन्हें 1995 में लिखित उनकी रचना “घर का रास्ता”  के लिए दिया गया। यह रचना भी अन्य रचनाओं की तरह खूबसूरत थी। एक कविता जो इसी रचना में संकलित है बारिश बड़ी खूबसूरती से लिखा गया है। इस रचना संग्रह में कवि ने लगभग हर विषय को छुआ है फिर वो चाहे हारमोनियम हो या फिर पैसे या उम्मीद आदि।

ऐसा नहीं है कि मंगलेश डबराल ने बस तमाम उम्र बस कविता लिखने का काम किया।  बल्कि न सिर्फ वे शानदार कवि थे बल्कि एक कुशल लेखक, आलोचक, संपादक और मौजूदा वक्त के सबसे पसंदीदा कवियों में शुमार थे। वर्ष 2015 में पहाड़ का यह कवि चर्चा में तब आया जब मंगलेश डबराल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया। ये कदम उन्होंने दादरी घटना, कन्नड़ लेखक एम कलबुर्गी की हत्या और देश में ‘असहिष्णुता की बढ़ती संस्कृति विरोध में जताया था। इसके अलावा वे सोशल मीडिया   जरिये भी कई समस्याओं पर अपनी बात रख चुके हैं। वे जितने प्रखर बात अपनी कविता के माध्यम से रखते थे उतने ही प्रखरता से वे सरकार  और मौजूदा समस्याओं पर अपनी प्रतिक्रिया  देने से पीछे नहीं हटते थे।

 मंगलेश डबराल के अन्य लिखित कृत्य थे ‘पहाड़ पर लालटेन’ उनका पहला संग्रह था जो 1981 में आया, घर का रास्ता, 1995 -हम जो देखते हैं, 2000 – आवाज़ भी एक जगह है, मुझे दिखा एक मनुष्य, 2013 – नए युग में शत्रु, कवि ने कहा आदि।

मंगलेश डबराल का द्वारा लिखित गद्य उनकी यात्रा डायरी ‘एक बार आयोवा’ और ‘लेखक की रोटी’ में देखा जा सकता है।

पटकथा – नागार्जुन, निर्मल वर्मा, महाश्वेता देवी, यू. आर. अनंतमूर्ति, कुर्रतुल ऐन हैदर तथा गुरुदयाल सिंह पर केंद्रित वृत्त चित्रों का पटकथा लेखन।

मंगलेश डबराल को इन  पुरस्कार व सम्मान से नवाज़ा गया है– ओमप्रकाश स्मृति सम्मान (1982), श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार (1989), साहित्य अकादमी पुरस्कार (2000), शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, कुमार विकल स्मृति सम्मान, हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान।

 

कहीं मुझे जाना था नहीं गया
कुछ मुझे करना था नहीं किया
जिसका इंतज़ार था मुझको वह यहाँ नहीं आया
ख़ुशी का एक गीत मुझे गाना था गाया नहीं गया
यह सब नहीं हुआ तो लम्बी तान मुझे सोना था सोया नहीं गया
यह सोच-सोचकर कितना सुख मिलता है
न वह जगह कहीं है न वह काम है
न इंतज़ार है न वह गीत है और नींद भी कहीं नहीं है

वर्ष 2000 को जब उत्तराखंड एक अलग राज्य बना तो जैसे साहित्य अकादमी के रूप में उत्तराखंड को एक उपहार मिल गया। मंगलेश डबराल की ख्याति वैश्विक साहित्य के अध्येता और कुशल अनुवादक के रूप में भी है। इसके अलावा पूर्वाग्रह और जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित पत्रों के वे साहित्यिक संपादक भी रहे हैं। वे  हिंदी पैट्रिएट, प्रतिपक्ष और आसपास जैसी पत्रिकाओं से भी जुड़े रहे। 16 मई 1948 को जन्मे मंगलेश डबराल ने 73 वर्ष की अवस्था में 9 दिसम्बर 2020 को अंतिम सांस ली।  9 दिसंबर 2020 को वे अपने शरीर को छोड़ कर अपने शब्दों के रचे-बसे संसार को छोड़ कर चले गए। वर्ष 1997 में मंगलेश डबराल द्वारा उक्त लिखित “कहीं मुझे जाना था”, लगता है उनके आत्मा के शरीर छोड़ कर किसी ऐसे ही सफर की बात रही होगी। पर उनकी अँधेरे के खिलाफ जलाई लालटेन हमेशा जलती रहेगी ।

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