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उत्तराखंड के वाद्ययंत्र

उत्तराखंड के वाद्ययंत्र

उत्तराखंड की  संस्कृति और  लोककला विश्वप्रसिद्ध है। यहाँ के संगीत को विश्वधरोहर के रूप में संजो के भी रखा गया है।  उत्तराखंडी संगीत में प्रयुक्त होने वाले वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल भारत के साथ- साथ विश्व के हर  कोने में किया जाता है। इन वाद्य यंत्रों के बिना उत्तराखंडी संस्कृति थोड़ी फीकी सी लगती है। उत्तराखंड के वाद्ययंत्रों को जानना इसलिए भी आवश्यक हैं क्यूंकि इससे जुड़े सवाल अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में भी पूछे जाते हैं।  इस पोस्ट में हम जानेंगे उत्तराखंड के प्रमुख वाद्ययंत्र के बारे में । इसलिए पोस्ट अंत तक पढ़े साथ ही अपने दोस्तों के साथ शेयर करें।

 

 

1. ढोल- दमाऊं (दमाना)-

उत्तराखंड के वाद्ययत्रों में प्रमुख जो वाद्य है वह ढोल – दमाऊं हैं। यह  उत्तराखंड  का प्रमुख वाद्ययंत्र है। ढोल दमाऊं साथ-साथ बजाए जाते हैं। जब ढोल बजता है तो दमाऊं भी उसके साथ अवश्य बजाया जाता है। बाएं हाथ की उंगलियों द्वारा शब्दोत्पत्ति करता हुआ आकर्षक रूप से बजाता है। दमाऊं नगाड़े का छोटा रूप है। बाजीगर माला की तरह दमाऊं को गले में लटकाकर दोनों हाथों से लाकुड़ देकर नगाड़े की तरह बजाता है। ढोल के साथ दमाऊं के स्वर बड़े आकर्षक होते हैं। दोनों के सम्मिलित स्वर ही वाद्य को जान देते हैं।  ढोल सागर ग्रंथ के आधार पर ढोल दमामा बजाया जाता है। ढोल सागर जो अब मिलता है, उसमें संस्कृत, गढ़वाली और हिन्दी के शब्द साथ-साथ मिलते हैं। ढोल दमाऊं वाद्य सम्पूर्ण गढ़वाल का प्रिय वाद्य है। जिसके द्वारा धार्मिक नृत्यों से लेकर साधारण ढंग के नृत्य तक सम्पन्न किए जाते हैं। देवताओं के आह्वान के समय बाजीगर जिस लय और ताल से ढोल दमाऊं का वादन करते हैं, उस समय साधारण व्यक्ति का हृदय भी कांप उठता है।

ढोल सागर- सिद्धों की वाणियों के अतिरिक्त विद्वान समाज और घूमन्तु संन्यासियों ने नाथ पंथ से प्रभावित होकर, जिन ग्रन्थों की रचना की, वे गढ़वाल, बंगाल, महाराष्ट्र और भारत से बाहर चीन, बर्मा आदि में समान रूप से प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। गढ़वाल में इससे संबंधित जिस साहित्य का पता चलता है, उसमें एक ग्रंथ ढोल सागर भी है। ढोल सागर नाम सुनते ही विशाल काव्य ग्रन्थ का अनुमान लगता है किन्तु यह अन्य आकार की दृष्टि से ऐसा है नहीं। ढोल का बीज में वृक्ष वाला विराट अर्थ लेकर जिस दार्शनिकता का खुलासा करने की कोशिश इसमें की गई है। इस दृष्टि से, आकार लघु होने पर भी, इसकी महत्ता लघु नहीं है। भारत भर के मंगल मुहूर्तों पर ढोल बजाने का सगुन प्राचीनकाल से माना जाता है। गढ़वाल में यह कार्य यहां के हरिजनों की एक जाति औजी (ढोल वादक) द्वारा होता है। इन्हीं के लिए इस की रचना हुई प्रतीत होती है। ढोल सागर ग्रन्थ में स्थान-स्थान पर सुनो रे औजी कहकर सम्बोधित किया गया है। ढोल सागर ग्रन्थ अगस्त सन् 1932 में पं. ब्रह्मानंद थपलियाल द्वारा श्री बदरीकेदारेश्वर प्रेस से प्रकाशित हुआ। डॉ. शिवप्रसाद डबराल ‘चारण’ ने सन् 1993 में भवानीदास धसमाना द्वारा संग्रहीत दमोसागर प्रकाशित किया।ढोल की प्राचीनता के विषय में कहा गया है कि सर्वप्रथम इन्द्र का ऊदामदास ढोली या, जिसका ‘गगन को ढोल अविकारं यम शून्यं शब्दम्’ था, एवं कलियुग में राजा विक्रमाजीत भगवानदास ढोली था। जिसका ‘अंसतम को ढोल बस्तर को शब्दम् था।




 

2-डौंर थाली-

डौर थाली गढ़वाल का दूसरा प्रमुख वाद्य है। डौर (डमरू) शिव का वाद्य है। वादक ढोल की तरह डमरू को लाकड़ और हाथ से बजाता है। घुटनों के बीच डमरू को रखकर डौरिया डमरू बजाने वाला दाहिने हाथ से डौर पर शब्द करता है और बायें हाथ से शब्दोत्पत्ति में उंगलियों का संचार कर आवश्यक देवताओं की तालों की उत्पत्ति करता है। कांसे की थाली बजाने वाला बायें हाथ को उठाकर बायें अंगूठे पर थाली को टिकाता है और दायें हाथ से लाकुड़ थाली पर माराता है, जिससे डौर के शब्दों के अनुसार शब्द निकलते हैं। देवताओं का नर्तन होता है।डौर-थाली वादन केवल ब्राह्मण पुरोहित करते हैं। इसको घड़ियाला या घड़ियालो कहते हैं। घड़ियाला देव शक्ति के आह्वान, नर्तन एवं पूजन के लिए ब्राह्मण पुरोहितों के द्वारा जागर गाकर डौर थाली बजा-बजा कर सम्पन्न करता है। जागरी या घड़याल्या विशेष कर देवनृत्यों में देवताओं को नचाने और देवशक्ति के आह्वान के लिए ही डौर थाली बजाकर नृत्य करते हैं। या कभी धर्याभूत, आंछरी, रणभूत और भूत नचाने के लिए भी घड़याल्या इनके जागर गाकर नृत्य करवाता है। शेष नृत्यों को नचाने का कार्य औजी ही करते हैं।

3-ढोलक-

ढोलक या ढोलक वाद्ययंत्र को गढ़वाल के बाद्दी पेशेवर जाति बजाते हैं। घर के आंगन में बाद्दी ढोल बजाता है। बादणी बाद्दी की पत्नी या कोई और नर्तकी ढोलक के तालों के साथ नृत्य करती है। बाद्दी गाता है बादीणी स्वरों को दुहराती है और नृत्य करती है। ऐसे नृत्य में नर्तकियों की संख्या तीन तक हो सकती है। बाद्दी को बेडा और बादणी को बेडिन के नाम से भी जाना जाता है। ढोल ताल के साथ बजाया जाता है।

4-सूर्य और रणसिंघा-

ये आकार में लम्बे पीतल या तांबे के बने होते हैं। युद्ध के अवसरों पर इन वाद्य यंत्रों के बजाने से सूचना देना या सावधान करने का काम लिया जाता था। सूर्य और रणसिंघा का प्रयोग मेवाड़, राजस्थान में भी होता है।




5- भंकोरा-

भंकोरा तांबे का एक इंच गोलाई से लेकर तीन इंच गोलाई तक बना हुआ वाद्य यंत्र जिसकी लम्बाई काफी होती है। पर्वतीय क्षेत्र के इस वाद्य यंत्र से मीठे स्वर निकलते हैं। केवल देवी-देवताओं के नर्तन पूजन में (नौबत या धुंगाल के अवसर पर) केवल सवर्णों के द्वारा ही वाद्य बजाया जाता है।

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6-मोछंग-

यह छोटा सा वाद्ययंत्र लोहे की पतली शिराओं से बना हुआ होता है। जिसे ओठों पर स्थिर कर एक अंगुली से बजाया जाता है। अंगुली के संचालन ओठों और दांतों की हवा के विशेष प्रभाव से मधुर स्वर निकलते हैं। महिलाएं एवं पशुचारक घने वनों में इस वाद्ययंत्र को बजाते और नृत्य करते हैं।

7-बांसुरी-

बांसुरी मोटे रिंगाल या बांस से बांसुरी बनाई जाती है। बांसुरी को प्राय: वनों में पशुचारक बजाते हुए नृत्य करते हैं। उत्तराखंड के संगीत में भी बांसुरी का प्रमुख स्थान है। इसकी धुन  मोहित कर देती है।




8-अलगोछा-

अलगोजा दो बांसुरियों के एक साथ मुंह में लेकर बजाया जाता है। अलगोछा को रामसोर के नाम से भी जाना जाता है। खुदेड़ अथवा झुमैलो जैसे करुण प्रधान गीतों को अलगोजे के स्वरों में गाया जाता है। घने वनों, नदी-नालों की तलहटी में व पर्वत शृंखलाओं में बांसुरी और अलगोजे के स्वर मधुर लगते हैं।

9-हुड़की-

उत्तराखंड के वाद्ययंत्र में यह छोटा सा वाद्ययंत्र डमरू के आकार का होता है पर गोलाई में यह काफी छोटा होता है। प्राचीनकाल में, और विशेषकर युद्ध के समय, जब ठकुरी राजा थे तो चारण या भाट रणक्षेत्र में वीरों का उत्साह बढ़ाने जाते थे। हुड़की को बजाकर वीरों के वंशजों के पराक्रम का बखान कर और युद्ध में लड़ने वाले वीर की वीरता का बखान कर हुड़क्या कमाल का कार्य करता था। मूलत: हुड़की भाटों का वाद्य था।आजकल हुड़क्या हुड़क्याणो को लकेर प्रणय गीतों को गाने लगे हैं। गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति के आंगन में स्वयं भी गीत गाता हुआ नाचता है, और हुड़क्याणो अभिनयात्मक नृत्य करती है। पंवाड़े व वीर गीतों के गायन में ‘हुड़कीÓ का सबसे अधिक प्रयोग होता है।

 

10-नगाड़ा-

मूलत: नगाड़ा युद्ध का वाद्ययंत्र है। मंदिरों में धुयांल के अवसर पर बजाया जाता है। गड़वाल में सरो नृत्य करवाने के अवसर पर आजकल नगाड़े का उपयोग किया जाता है।

11-मसकबाजा-

मसक बाजा के चमड़े के थैले पर मुख्य रूप से दो पाइप लगे होते हैं। एक से थैले के अंदर हवा भर दी जाती है, दूसरे पाइप को बांसुरी के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। पांच पाइप और होते हैं, जिन्हें कंधे पर रखा जाता है। यह सेना का वाद्य यंत्र है, जो गढ़वाल का प्रमुख वाद्य यंत्र है। इसका उपयोग विवाह-शादियों के शुभ अवसर पर मुख्यरूप से किया जाता है।

12-घन वाद्य-

उत्तराखंड के वाद्ययंत्र के रूप में यह 25-30 वर्ष पूर्व तक पूरे उत्तराखंड में समान रूप से बजाया जाता था। आधुनिकता की होड़ में इस वाद्य का प्रचलन प्राय: बंद हो गया है। पश्चिमी नेपाल, जिसे डोटी जिले के अंचल से जाना जाता है, वहां इसका व्यापक रूप से वादन होता था, अंतर केवल इतना है कि उत्तारखंड में बिणाई की लंबाई लगभग 05 इंच से 06 इंच तक होती है। इसकी पत्ती लम्बी होने से इसकी टंकार (कम्पन की ध्वनि) भी अधिक होती है। यह वाद्य यंत्र उत्तराखंड के अलावा राजस्थान, उड़ीसा एवं आंध्र के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का प्रिय लोक वाद्य है। इस बिणाई को लोहे की पत्तियों को थोड़ा सा बड़ा आकार देकर आकाशवाणी केन्द्रों पर लोक संगीत एवं सुगम संगीत के संयोजन में पार्श्व संगीत के रूप में किया जाता है, जो अति कर्णप्रिय होता है।




13-सारंगी-

वादी या मिरासियों के प्रिय बाजे का नाम सारंगी है। पेशेवर जातियों का यह मुख्य वाद्ययंत्र है। इसके स्वर बहुत मीठे और रसीले होते हैं। एक तारा चिमटा और कंसाल का प्रयोग भी वाद्ययंत्रों के रूप में होता है। एक तारे का चलन केवल साधु संत, भक्ति गीतों को गाने में करते हैं। चिमटे का प्रयोग ढोलक के साथ होता है। कंसाल दो पीतल की कटोरियों जैसी होती है। देवपूजन में शंख बजाना भी शुभ समझा जाता है।

 

14-बिणाई-

बिणाई मुख्यत: ग्रामीण महिलाओं द्वारा बजाए जाने वाला लोक वाद्य है। मुरली और बिणाई का उपयोग स्त्री-पुरुष, युवक-युवतियां विशेष रूप से करते हैं। अब प्रेमी-प्रेमिकाएं अथवा नवविवाहित जोड़े एक-दूसरे से बिछुड़ते हैं, तब अपनी विरह की पीड़ा को बहलाने या कम करने के लिए मुरली और बिणाई लोक वाद्यों के स्वरों को सुना जाता है।

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