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उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली | Uttarakhand Folk Painting Style

उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली

उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली में प्रकृति का वास है। उत्तराखंड  चित्र शैली को गढ़वाल चित्रकला शैली के नाम से भी जाना जाता है। इस चित्र शैली का आरंभिक वर्ष 1658 से माना जाता है, जब गढ़वाल नरेशो के दरबारों में चित्रकारों को तसबीरदार कहा जाता था। गढ़वाल चित्र शैली की शुरुवात महानतम चित्रकार मोलाराम से हुई।  मोलाराम की प्रमुख चित्र शाला श्रीनगर पौड़ी गढ़वाल में स्थित थी। 16 वीं शताब्दी से 19 वीं शताब्दी में जम्मू से लेकर गढ़वाल में प्रचलित चित्र शैली को ही पहाड़ी चित्र शैली कहा जाता है।



मोलाराम की चित्रकारी को बैरिस्टर मुकुंदी लाल ने दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। गढ़वाल चित्र शैली का मुख्य विषय रुकमणी, मंगल, नायिका भेद, रामायण, महाभारत व कामसूत्र है।  1803 में उत्तराखंड में एक विनाशकारी भूकंप में मोलाराम की चित्रशाला ध्वस्त हो गई जिस कारण उनके द्वारा बनाए गए कुछ ही चित्र संरक्षित हो सके। उत्तराखंड लोककला चित्र शैली मुख्यता देवी देवताओं परंपराओं और प्रकृति पर आधारित है। उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली में कांगड़ा चित्र शैली झलक मिलती है। मगर फिर भी उसका प्रभाव गढ़वाल चित्रकला शैली पर न पड़ सका।

उत्तराखंड के इतिहास पर यदि नजर दौड़ाएं तो उत्तराखंड की चित्रकला शैली का विकास पंद्रहवीं शताब्दी में बलभद्र शाह द्वारा श्रीनगर में काशी से आए कलाकारों द्वारा महल निर्माण, कुमाऊं में संसार चंद के समय कांगड़ा चित्र शैली, पृथ्वीपति शाह द्वारा मुग़ल राजकुमार दाराशिकोह को शरण देने पर मुगलशैली व 1829 में कांगड़ा के नरेश अनिरुद्ध चंद द्वारा अपनी पुत्री का सुदर्शन शाह से विवाह के बाद देखने को मिला।

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उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली या गढ़वाल चित्र शैली के प्रकार

 

1. ऐपण (छिपण)

उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली में ऐपण का एक प्रमुख स्थान है। इस कला का उपयोग मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठानों व मांगलिक कार्यों में किया जाता है। ऐपण को मुख्यत: तीन उंगलियों से लिखा जाता है इसके बिना धार्मिक अनुष्ठान त्यौहार व पूजा अधूरी मानी जाती है। धार्मिक अनुष्ठानों में इस कला का प्रयोग चौकी बनाने व दहलीज व आंगन में सजावट के लिए भी किया जाता है। इसके अंतर्गत गेरू (लाल मिट्टी) व चावल के घोल (विसवार) से सूर्य, चंद्र स्वास्तिक ,शंख ,पुष्प आदि आकृतियां बनाई जाती हैं। उत्तराखंड के अलावा अन्य राज्यों में भी इस कला का प्रयोग किया जाता है जिसे हर राज्य में इसे अन्य नाम से पुकारा जाता है जैसे असम और बिहार में एपोना, उत्तर प्रदेश में अरियाना , राजस्थान और मध्य प्रदेश में मंदाना, गुजरात और महाराष्ट्र में रंगोली, दक्षिण भारत में कोल्लम , आंध्र प्रदेश में मुगगू और उड़ीसा में अल्पना कहते हैं। उत्तराखंड में चंद वंश के दौरान इस कला की स्थापना हुई थी। यह कला देवी देवताओं और प्रकृति के पहलुओं पर आधारित है। वर्तमान समय में ऐपण विकसित रूप ले चुका है और कपड़ों में बर्तनों में भी बनाया जाने लगा है मांग और रुचि को देखते हुए कई संस्थानो में इसका प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

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2. कांगड़ा चित्रशैली

उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली में कांगड़ा चित्रशैली की भी साफ़ झलक देखी सकती है। इस चित्रकला शैली की शुरुआत महाराजा संसार चंद के शासन काल में हुई, कांगड़ा चित्र शैली को चित्रकारी का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। महाराजा संसार चंद वैष्णव धर्म के अनुयाई व कृष्ण भक्त थे। यही कारण था कि उत्तराखंड चित्र शैली में कृष्ण ही छाए रहे । इस चित्र शैली से संबंधित चित्र विश्व के अनेक संग्रहालय में संरक्षित है।कांगड़ा शैली के प्रमुख चित्रकार खुशाला, मानकू, कुशनलालफत्तू के नामो के हस्ताक्षर युक्त चित्रों का उल्लेख इतिहास में है । परंतु अन्य 2 चित्रकारों के नाम बसिया एवं परखू के नामों की चर्चा इतिहास में व्यापक रूप से हुई है।

ऐसा माना जाता हैं कि परखू राजा संसार चंद का सबसे योग्य और निपुण चित्रकार था । कांगड़ा चित्र शैली को रंगों का काव्य भी कहा जाता है। यह चित्र रूप और रंगों के मिश्रण के लिए जाने जाते हैं,और प्रेम पर आधारित होते हैं । कांगड़ा चित्र अधिकांशत लघु आकार में बने होते हैं इस चित्र शैली में अमिश्रित रंगों का प्रयोग होता है और चित्रों को ओज कोमल दिखाने के लिए हल्के रंगों का प्रयोग किया जाता है। इस चित्र शैली में नारी चित्रण को विशेष महत्व प्रदान है और यह चित्र शैली में अंग भाव भंगिमा ओं का सजीव चित्रण है।

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3.बसोहली या बसोली चित्र शैली

बसोली के वंशज अपने को पांडवों की संतान मानते थे और इस चित्र शैली की स्थापना 1950 में हुई। यह चित्र शैली हिंदू धर्म व परंपराओं से प्रभावित है सर्वप्रथम यह कला लोक कला पर आधारित थी, किंतु बाद में इसमें मुगल कला का भी समन्वय हो गया। इन चित्रों में मुख्यता रेखाओं में ओज एवं उन्मुक्ता है साथ ही रूप और लावण्य श्रृंगार एवं यौवन से सजी नारी तथा प्रकृति चित्रण में वर्षा और तूफान के साथ अंधेरी रात का चित्रण मुख्य रूप से हुआ है। इस शैली में नारी आकृतियां कोमल एवं ओज पूर्ण तथा नेत्र कमल के आकार की बनाई गई है जिसमें दो-चार केश लट कपोल पर लटकते चित्रित है। मुगल चित्र शैली का समन्वय होने के कारण पहनावा मुगलिया ही प्रचलित रहा। इस चित्र शैली में आभूषण भी विशेष रूप से चित्रित है। यहां तक कि राक्षसों को भी आभूषण पहने चित्रित किया गया है।

नायिका का चित्र बादामी रंग से किया जाता था, और पक्षियों का चित्रण बंद पिंजरे में, इस चित्र शैली में कबूतर और तोतों को जोड़े में प्रेम प्रतीक के रूप में विशेष रूप से चित्रित किया गया है इसके अलावा आलेखन उसे युक्त द्वार, खिड़कियां, नक्काशीदार लकड़ी, पत्थर के स्तंभ, इत्र दान और पुष्प पात्र आदि को भी खूबसूरती चित्रित किया गया है। चित्रों को चमकदार बनाने के लिए स्वर्ण रंग का प्रयोग भी बखूबी से किया जाता था इस चित्र शैली में ग्रंथ रसमंजरी, गीत गोविंद रामायण श्रीमद्भागवत पुराण, राग माला चित्रण के साथ सामाजिक जीवन की झांकी भी चित्रकारों में प्रस्तुत की है। इस शैली में लाल रंग का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता था तथा अन्य चटक रंग पीला नीला और स्वर्ण चांदी आदि का प्रयोग भी किया गया है। इस शैली के प्रमुख चित्र माखनचोर, ओखल बंधन, गिरी गोवर्धन, दशावतार, गणेश आदि चित्रित है। इसके अलावा इस चित्र शैली में कविताएं व दोहे भी लिखें मिलते हैं। इस चित्र शैली की मुख्य चित्रकार मानकू थी जो कि एक महिला चित्रकार थी।




4.गुलेर चित्र शैली

चित्रकारी को ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय गुलेर चित्रकारी को जाता है। कांगड़ा कलम गुलेर चित्रकारी का ही विकसित रूप है। हरिपुर के राजा हरिचंद के अथक प्रयासों से गुलेर चित्र शैली का विकास हुआ और इसे अन्य चित्र शैलियों की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त हुआ। राजा हरिचंद के समय हरिपुर पहाड़ी कला एवं संस्कृति का केंद्र था । उस समय मैदानी क्षेत्रों में असुरक्षा के कारण अनेक चित्रकार पहाड़ी क्षेत्रों में भाग कर आ गए थे और उन्हें यहां पहाड़ी राजाओं के संरक्षण में चित्रकारी करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ, ऐसा कहा जाता है कि इसी समय गुलेर चित्र शैली का यौवन उभर कर आया। किंतु बाद में पहाड़ी राजा इस चित्र शैली को पहले जैसा संरक्षक ना दे सके और फिर धीरे-धीरे इस चित्र शैली के चित्रकार कांगड़ा चित्र शैली की ओर पुनः आकर्षित होने लगे। गुलेर चित्रों के विषय धार्मिक है जिसमें मुख्यता रामायण और महाभारत की घटनाओं का वर्णन मिलता है। धार्मिक चित्रों में मुख्यत गीतगोविंद, शिव परिवार, कृष्ण चरित्र ,होली उत्सव है साथ ही राज दरबार से संबंधित चित्र भी उल्लेखनीय है ।नायिका भेद संबंधी चित्र इस चित्र शैली की एक अन्य विशेषता है। जिसमें श्रृंगार युक्त नायिकाएं होती हैं इन नायिकाओं में कृष्ण पक्ष ,अभिसारिका पेषितपतिका आदि गुलेर शैली के भावपूर्ण चित्र हैं। इस चित्र शैली में चित्रों में व्यक्ति सजीवता देखने को मिलती है इस चित्र शैली के प्रारंभिक चित्र पंडित सेऊ और उनके पुत्र नैनसुख और पुत्री मानकू ने बनाए हैं ।
डॉ बी एन गोस्वामी ने रैना भ्राताओ के सौजन्य से एक चित्र प्राप्त हुआ है। जिसमें 15 भुजीदेवी दिखाई गई है जो एक पैर पर खड़ी है और उसके सिर पर श्री गुलेर लिखा है साथ ही उसके आसपास 19 रियासतों का नाम फीकी स्याही में लिखा है। यहां पर श्री गुलेर का अर्थ चित्रकार यह लगाते है कि यह चित्रकला श्रेष्ठ थी।

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5. भित्ति चित्र शैली

इस चित्र शैली में बारीक और कोमल रेखाओं का प्रयोग किया गया है और स्त्री पुरुष का अनुपम सौंदर्य दिखाया गया है। साथ ही शासको के रुतबे व राजमहल से संबंधित चित्रों को दर्शाया गया है। इस चित्र शैली में मानव शरीर लंबा व स्त्रियों को आभूषणों के साथ लहंगा व पारदर्शी आंचल पहने दर्शाया गया है। इसके अलावा पर्वत सरिता काले में एक नीला आकाश उपवन उद्यान व अनेक प्रकार के पशु पक्षियों का चित्रांकन किया गया है। इस शैली के मुख्य चित्रकार लेहरु, निक्का, ईश्वर, मगनु, हीरालाल, गंगाराम, बिल्लो राम और प्रेम लाल है।





6.जयूँति पट्टा

उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली के अंतर्गत आने वाली इस चित्रकला शैली में महालक्ष्मी, महाकाली, गणेश, महासरस्वती व दुर्गा की मानव आकृतियों का अंकन किया जाता है। यह चित्रकला कागज कपड़े और लकड़ी पर बनायी जाती हैं । यह मुख्यता धार्मिक अनुष्ठानों जैसे जन्माष्टमी, दशहरा, दीपावली, नवरात्रि, विवाह संस्कार में बनाई जाती है।  विवाह के अवसर पर तीन देवियों लक्ष्मी सरस्वती मां दुर्गा के साथ गणेश की आकृति बनाई जाती है। इसके अलावा हरेला, नाग पंचमी, दुर्गाष्टमी पर दुर्गा थापे का अंकन कर  उसे दीवार पर चिपका दिया जाता है और उसके बाद पूजा अर्चना की जाती है।

7. बारबूंद या बरबूंद  चित्र शैली

इस लोककला में रेखा और बिंदुओं द्वारा इस प्रकार की आकृतियां बनाई जाती है जिनमे बिंदुओं को डालकर रेखाओं को जोड़ दिया जाता है। उत्तराखंड चित्रकला शैली के अंतर्गत आने वाली इस शैली में एक ही नमूने से पूरी दीवार को चित्रित करने को बार बूंद बनाना कहते हैं।  परंपरा के अनुसार दीवार पर कुछ निश्चित बिंदुओं को बनाकर व उनकी रेखाओं को जोड़कर उनमें विभिन्न रंगों से भर दिया जाता है।

8.पिछौड़ा

यह उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में महिलाओं का मुख्य परिधान है। जो एक ओढ़नी होती है जिसे रंगावली भी कहते हैं। इस ओढ़नी को स्त्रियां घर पर ही तैयार करती हैं। इस ओढ़नी पर जो छपाई होती है उसे कुसुम और ओढ़नी को कुसुमिया पिछोड़ा कहते हैं। यह जयपुरी चुन्नी जैसा वस्त्र है जिसे धार्मिक, मांगलिक आयोजनों, त्यौहारों व विवाह पर पहना जाता है।

9 .डिकरा चित्रशैली

पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा हरयाली के शुभ अवसर पर मिट्टी से देवी देवताओं की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं जिन्हें डिकरा कहते हैं। उत्तराखंड की इस  चित्रशैली को कोहली ऐपण भी कहा जाता है। यह पर्व सावन मास के पहले दिन कर्क कर्क संक्रांति को मनाया जाता है। इसे शिव पार्वती के विवाह का दिन भी माना जाता है। इसमें शिव,पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और शिव के गणों की मिट्टी की मूर्तियां बनाई जाती है। इन मूर्तियों पर चावलों के सफेद पेस्ट का लेप किया जाता है। सूखने पर इसे विविध रंगों से सजा दिया जाता है। इसके बाद इसपर वस्त्राभूषण कर सजाकर मंदिर में पूजा के लिए रख लिए जाते हैं।

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10. वसुधारा

इस चित्रकला शैली में घर के मंदिर व दहलीज को गेरू से लीपकर बिस्वार के अनेक धाराएं डाली जाती हैं। जो दुग्ध धाराओं की तरह प्रतीत होती है। इस प्रकार का चित्रांकन वसुधारा कहलाता है। इसके अतिरिक्त जीव मातृका पट्टा, जन्माष्टमी पट्टा गंगा दशहरा पत्र, बेदी अंकन, सेली (थाली), षष्ठी चौकी, पौ., खोड़िया आदि का भी प्रचलन है।

11. नात

इस चित्रकला शैली में रसोई घर की दीवारों पर गेरू तथा बिस्वार से लक्ष्मीनारायण चेटुआ तथा बिखोती के चित्र बनाकर धन धान्य की कामना की जाती है। इन प्रतीकात्मक चित्रों को टुपुक भी कहा जाता है ।

12. थापा

थापा चित्रशैली में दीपावली, दशहरा आदि त्योहारों पर नवग्रह पूजन तथा दुर्गा पूजा पर नवग्रहों एवं दुर्गा का चित्रण, चावल से बने श्वेत रंग के साथ सामान्य रंगों का प्रयोग करके किया जाता है।

13 . सिद्ध शैली

इस शैली में बिंदु त्रिकोण वृत्त और वर्ग के योग से देवी-देवताओं के विभिन्न यंत्रों को मनाया जाता है।




14 .देवी शैली या पोथी चित्र

इस चित्र शैली में जन्मपत्री, कुंडली, वर्षफल व पंचांग पर पुरोहितों द्वारा विवरण के साथ-साथ जो अंकन किया जाता है। वह पोथी चित्रण कहलाता है।

15. लौकिक शैली

इस शैली में वास्तविक तथा काल्पनिक जीवों के चित्र होते हैं।

16 .पौ

इस चित्र शैली का प्रयोग दीपावली में किया जाता है.  इसके अंतर्गत लक्ष्मी पौ के पदचिन्ह घर के मुख्य द्वार से तिजोरी या पूजा गृह तक बनाए जाते हैं।

 

आभार – उत्तराखंड लोक चित्रकला शैली के बारे में यह सुन्दर आलेख जाह्नवी द्वारा लिखा गया है। जाह्नवी हेमवती नंदन बहुगुणा से पत्रकारिता में परास्नातक कर रही हैं।


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Deepak Bisht

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