उत्तराखंड का सम्पूर्ण इतिहास | History of Uttarakhand in Hindi

उत्तराखंड का सम्पूर्ण इतिहास | History of Uttarakhand

उत्तराखंड का परिचय

उत्तराखंड का परिचय

देव भूमि उत्तराखंड हिमालय की तलहटी पर बसा एक सुन्दर पहाड़ी राज्य है। यह राज्य पर्यटन के साथ-साथ अपनी संस्कृति, परंपराओं व पारस्परिक सौहार्द के लिए भी विश्वभर में जाना जाता है। उत्तराखंड राज्य में 13 जनपद है जिसकी ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण

Advertisement
और शीतकालीन राजधानी देहरादून है।

उत्तराखंड राज्य में दो मंडल गढ़वाल मंडल और कुमाऊं मंडल। 4 मार्च 2021 को राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैरसैण विधानसभा के सदन में तीसरे मंडल गैरसैण की घोषणा की गयी।

इस मंडल में गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग व चमोली और कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा और बागेश्वर जनपद को सम्मलित किया गया था। लेकिन राज्य की कमान मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के  हाथों में आते ही उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री की घोषणा का नोटिफिकेशन राजयपाल के समक्ष जाने से पूर्व ही रोक लगा दी। इस आदेश के बाद अभी भी गढ़वाल में दो ही मंडल हैं।

उत्तराखंड राज्य का वर्तमान जितना रोचक व आकर्षण से परिपूर्ण है उतना ही रोचक व महान इसका इतिहास भी है। नीचे उत्तराखंड का सम्पूर्ण इतिहास संक्षिप्त रूप से दिया गया है। इनके बारे में और अधिक जानकारी के लिए आप उनसे संबधित लिंक पर क्लिक करके जानकारी ले सकते हैं।



उत्तराखंड का इतिहास | History of Uttarakhand

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक काल

प्रागैतिहासिक काल

प्रागैतिहासिक काल को चित्र शैली का काल भी कहा जाता है क्योंकि इस काल में ज्यादातर सूचनाएं चित्र शैलियों के माध्यम से मिलती थी ऋग्वेद में उत्तराखंड को देवभूमि या मनीषियों की पुण्य भूमि और एतरेयपरिषद (आत्रेयब्राह्मण) में उत्तरकुरु ,व स्कंद पुराण में मानस खंड व केदारखंड दो भागों में बताया गया है जिसमें मानस खंड शब्द कुमाऊं और केदारखंड शब्द का प्रयोग गढ़वाल क्षेत्र के लिए किया गया है।

उत्तराखंड को इस काल में अन्य नाम ब्रह्मपुर उत्तरखंड और पाली भाषा में लिखे बौद्ध ग्रंथों में हिमवंत भी कहा गया है। इस काल में गढ़वाल क्षेत्र को बद्री का आश्रम और स्वर्ग आश्रम कहते थे और कुमाऊं क्षेत्र को कुर्मांचल नाम से संबोधित किया जाता था। उत्तराखंड में दो प्रसिद्ध विद्यापीठ भी स्थित थे बद्री का आश्रम और कण्वाश्रम।



कण्वाश्रम मालिनी नदी के तट पर था और यह स्थान राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी के लिए प्रसिद्ध है और इसी आश्रम में शकुंतला के पुत्र भरत का जन्म हुआ इनके बारे में शेर के दांत गिरने वाली कथा प्रचलित है और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा इसके साथ ही महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम् की रचना भी इसी आश्रम में की थी।

वर्तमान समय में यह स्थान पौड़ी (चौकाघाट) के नाम से जानी जाती है उत्तराखंड राज्य कितना प्राचीन है इसके सबूत आज भी यहां मौजूद है जैसे अल्मोड़ा में स्थित लाखु गुफा, लवेथाप, पेट शाला और चमोली में स्थित गोरखा गुफा, मलारी गुफा और कीमिनी गांव, उत्तरकाशी में हुडली, बनकोट पिथौरागढ में रामगंगा घाटी

Uttarakhand gk notes pdf
Buy Now

 

 

 

 

 

 

 


उत्तराखंड का ऐतिहासिक काल

उत्तराखंड का सम्पूर्ण इतिहास

कुणिंद वंश / शक वंश /नाग वंश

ऐतिहासिक काल के दौरान अनेक राजनीतिक शक्तियों का उदय हुआ। उत्तराखंड की पहली राजनीतिक शक्ति कुणिंद वंश थी और इस वंश का परम प्रतापी राजा अमोघभूति था। इस वंश ने सोने चांदी व तांबे के सिक्के बनाएं जिस पर राज कुणिंदस अमोघभूति लिखा था। चांदी के सिक्कों पर मृग और देवी के चित्र बनाए गए।

उसके बाद आए शक वंश जिन्होंने कई सूर्य मंदिर बनाए। जिनमें से कटारमल का सूर्य मंदिर सबसे प्रसिद्ध है जो अल्मोड़ा में स्थित है और शक संवत चलाया जो कि एक प्रकार का कैलेंडर है । इसके बाद बहुत कम समय तक राज करने वाले नागवंश और मौखरीवंश आए।  फिर आए वर्धन वंश जिसके राजा हर्षवर्धन थे। हर्षवर्धन के राज के समय बाणभट्ट ने अपनी पुस्तक हर्ष चरित लिखी।



चीनी यात्री ह्वेनसांग भी इसी समय भारत आए उन्होंने अपनी पुस्तक सी -यू -की (si-yu-ki) में उत्तराखंड को (po-li-hi-mo-pu-lo) कहा था । साथ ही हरिद्वार को मो-यो-ली (mo-yo-li ) कहा था। 648 ईसवी में राजा हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई और उसका राज्य कई टुकड़ों में विभाजित हो गया। फिर इसके बाद कार्तिकेयपुर राजवंश का का उदय हुआ ।

 


कत्यूरी वंश या कार्तिकेयपुर राजवंश

कार्तिकेयपुर राजवंश

कार्तिकेयपुर राजवंश को कुमाऊं का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है ,और इस राजवंश के प्रथम राजा ,राजा बसंत देव थे।  जिन्हें परमभदवारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि प्राप्त थी। उनकी शाखाएं कुछ इस प्रकार थी रजवार वंश जो असकोटा में था। मलल वंश दोती में ,और असंतिदेव वंश कतयूर में था। जिसमें सबसे ज्यादा प्रचलित रहा कत्यूरी वंश।

इस राजवंश ने लगभग 300 सालो सालों तक कार्तिकेय पुर को अपनी राजधानी बना कर रखा। जो वर्तमान का चमोली स्थित जोशीमठ है । इसी समय एक नया वंश पँवार वंश का उदय हो रहा था। और असुरक्षा को ध्यान में रखकर कार्तिकेयपुर वंश ने अपनी राजधानी कार्तिकेय पुर बदलकर कुमाऊं में बैजनाथ (बागेश्वर) और कार्तिकेयपुर के बीच की घाटी कत्यूरी घाटी में स्थापित कर दी ।



इस वंश के शासनकाल में आदि गुरु शंकराचार्य उत्तराखंड आए जिन्होंने विस्तृत रूप से बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार किया। जिसकी वजह से यहां बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हुआ ऐसी भी मान्यता है कि बद्रीनाथ पहले बौद्ध मठ हुआ करता था जिसे सम्राट अशोक ने बनवाया था आदि गुरु शंकराचार्य की मृत्यु 820 ईसवी में केदारनाथ में हुई।

इसके बाद सन् 1515 में पँवार वंश के 37वें शासक अजय पाल आए जिन्होंने गढ़वाल के 52 गढ़ो को जीतकर बनाया गढ़वाल, जिसकी राजधानी पहले देवलगढ़ थी और 1517 में बदलकर श्रीनगर कर दी गई इसके बाद इसी वंश के शासक रहे बलभद्र को ‘बहलोल लोदी’ ने शाह की उपाधि दी और इसके बाद पवॉर वंश के शासकों ने अपने नाम के आगे शाह लगाना शुरू कर दिया।

इसी बीच पश्चिमी नेपाल के राजा अशोक चलल ने कत्यूरी वंश पर आक्रमण कर दिया और कुछ हिस्सों पर अधिकार भी कर लिया। और कत्यूरी वंश का आखिरी शासक था ब्रह्मदेव जिसे वीरमदेव और वीर देव भी कहते थे। जब 1896 में तैमूर लंग का आक्रमण भारत में हुआ तो कत्यूरी वंश का आखिरी शासक हरिद्वार में शहीद हो गया और यहीं कत्यूरी वंश की समाप्ति हो गई।


चंद वंश

कुमाऊं का चंद राजवंश

इसके बाद आया चंद वंश ,चंद वंश का पहला राजा सोमचंद था और उनकी राजधानी चंपावत मे थी। चंद वंश का राजचिह्न गाय थी। इसी राजवंश में एक राजा भीष्म चंद आए इन्होंने राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा बदलने की सोची और इसी उद्देश्य से उन्होंने खगमरा किले का निर्माण भी करवाया ,किंतु जब यह किला बनकर तैयार हुआ तो राजा भीष्म चंद की मृत्यु हो गई ।



इसके बाद इसी वंश के राजा बालों कल्याण चंद ने चंपावत राजधानी को बदलकर अल्मोड़ा कर दिया और वहां लाल मंडी किला और मल्ला महल किले का निर्माण किया। मुगल कालीन साहित्य तुजुक जहांगीर और शाहनामा से ही पता चलता है कि चंद राजाओं के मुगल राजाओं से भी संबंध थे 1790 में चंद्र वंश के अंतिम राजा महेंद्र चंद्र को हराकर गोरखाओं ने कुमाऊं क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।


उत्तराखंड का सम्पूर्ण इतिहास

गढ़वाल का पंवार राजवंश

इसके बाद आती है नवीं शताब्दी जिसमें गढ़वाल 52 गढ़ो में बट गया था इसमें सबसे शक्तिशाली राजा थे भानु प्रताप । इसी दौरान गुजरात का एक शासक कनक पाल यहां आया जिसने भानु प्रताप की पुत्री से शादी कर यही बचने की सोची जिसके पश्चात कनक पाल ने पवॉर व परमार वंश की स्थापना की और चांदपुर जो वर्तमान समय में गैरसैंण है उसको अपनी राजधानी बनाया।

इसके बाद 1936 में राजा महापति शाह की मृत्यु के बाद उनके अल्प वयस्क पुत्र पृथ्वीपति शाह के को राजा बनाया गया। अल्प वयस्क होने के कारण उन्हें एक संरक्षिका रानी कर्णावती के साथ रखा गया ।

1936 में ही मुगल सम्राट के सेनापति नवजातखान ने दून घाटी पर आक्रमण कर दिया पर तब रानी कर्णावती ने यह हमला संभाल लिया और साथ ही कई मुगल सैनिकों को बंदी बना लिया था जिनकी नाक रानी कर्णावती के आदेश पर कटवा दी गई थी इसी वजह से रानी कर्णावती को नाक कटी रानी भी कहा जाता था।


उत्तराखण्ड में गोरखा शासन

उत्तराखंड पर गोरखाओं का शासन

•1790 में गोरखाओ ने गढ़वाल पर आक्रमण किया और उन्हें पराजय मिली ,1803 में गढ़वाल जब भयंकर भूकंप से पीड़ित था तो गोरखाओ ने फिर एक बार गढ़वाल पर आक्रमण किया और इस बार कुछ हिस्सों पर जीत भी पाली 14 मई 1804 में राजा प्रद्युमन शाह ने देहरादून के खुड़बूड़ा मैदान में गोरखाओ के खिलाफ युद्ध लड़ा जिसमें उनकी मृत्यु हो गई इसके पश्चात ज्यादातर उत्तराखंड गोरखाओ के अधीन हो गया।
इसे भी पढ़ें – उत्तराखंड में गोरखा शासन 


टिहरी रियासत

प्रद्युमन शाह के बाद उनके पुत्र सुदर्शन शाह आए जिन्होंने अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड हेसटिंगज (Hastings) से मदद मांगी और उनकी मदद द्वारा अक्टूबर 1814 में ब्रिटिश सेना ने तकरीबन 2-4 महीने के युद्ध के पश्चात गढ़वाल को एक बार फिर स्वतंत्र करा दिया किंतु 7 लाख युद्ध व्यय की भरपाई ना होने के कारण ब्रिटिश गवर्नमेंट ने पूरे हिस्से पर कब्जा कर लिया था।
इसे भी पढ़ें – कुमाऊं में अंग्रेजी कमिश्नर की सूचि 



मजबूरन राजधानी श्रीनगर से बदलकर टिहरी करनी पड़ी और परमार वंश की जागीर को टिहरी रियासत कहा जाने लगा इसके अगले वर्ष 1815 में अंग्रेजों ने कुमाऊं को गोरखाओ से जीत लिया था और फिर 28 नवंबर 1815 में चंपारण बिहार में ब्रिटिश गवर्नमेंट और गोरखाओ के बीच एक संधि ‘संगौली ‘की संधि हुई जिसके फलस्वरुप टिहरी रियासत को छोड़ सब कुछ ब्रिटिश  सरकार के अधिकार में आ गया।


कुमाऊं और गढ़वाल शब्द की उत्पत्ति

History of Uttarakhand in Hindi

कुमाऊं

ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु ने अपना कुरमावतार लेकर चंपावत के निकट स्थित चंपावती नदी के तट पर कुर्म पर्वत पर 3 वर्षों तक तपस्या की थी तभी से इसका नाम कुर्मांचल पड़ा जिसे आगे चलकर कुमाऊं कहा जाने लगा कुर्मावतार भगवान विष्णु का कछुए का रूप था कुर्म पर्वत या कामदेव पर्वत पर आज भी भगवान विष्णु के पैरों के निशान अंकित है पहले यह नाम सिर्फ चंपावत और उसके आसपास के इलाके को ही कहा जाता था.

पर जब से चंद वंश का शासन हुआ तो उनका जितना भी साम्राज्य था वह कहलाया कुर्मांचल और उनका साम्राज्य उस समय अल्मोड़ा पिथौरागढ़ नैनीताल तक फैला हुआ था उस समय के मुगल शासक भी इसे कुमाऊं कहते थे इस बात का जिक्र आइने-ए-अकबरी में भी मिलता है।



पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने यहां कुर्मावतार में तपस्या करने के कारण इस स्थान का नाम कुर्मांचल पड़ा किंतु शिलालेखों और ताम्र पत्रों से यह ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र का नाम कुर्मांचल या कुमाऊं बाद में पड़ा क्योंकि सम्राट समुद्रगुप्त के पर्याप्त प्रशस्त लेख में इस प्रांत को कार्तिकेयपुर कहा गया है.
तालेश्वर में भी उपलब्ध पांचवी और छठी शताब्दी के ताम्र पत्रों में भी कार्तिकेयपुर और ब्रह्मपुर नामों का उल्लेख मिलता है.चीनी यात्री ह्वेनसांग जब इस क्षेत्र में आया तो उसने भी इस क्षेत्र को ब्रह्मपुर नाम से संबोधित किया।


गढ़वाल

गढ़वाल क्षेत्र को पहले 52 गढ़ो का देश कहा जाता था और तब यहां पर 52 राजाओं का शासन हुआ करता था जो अलग-अलग राज्यों के स्वतंत्र राजा थे जो गढ़ थे वह छोटे-छोटे किले हुआ करते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग जब छठवीं शताब्दी में भारत आया था तो उसने भीअपनी पुस्तक में लिखा कि यहां के जो राजा थे उनके बीच में आपस में लड़ाई चला करती थी.

इनकी आपसी लड़ाई का ही फायदा उठाकर परमार वंश के प्रतापी राजा अजय पाल ने इन सभी 52 गढ़ो को जीतकर अपने अधिकार में ले लिया और सभी गढो़ का एक छत्र स्वामी बन गया और अजय पाल कहलाया गढ़वाला और उसका यह क्षेत्र ही कहलाया गढ़वाल।

गढ़वाल के 52 गढ़:

1. नाम -नागपुर गढ़, स्थान- नागपुर और संबंधित जाति – नाग जाति।
2. कोल्लीगढ़ , स्थान बछणसँयू और संबंधित जाति बछवाण बिष्ट।
3. रावडगढ़, बद्रीनाथ के निकट और रवाडी।
4. फल्याण गढ़, फलदा कोट ,फल्याण जाति के ब्राह्मण।
5. बांगर गढ़ ,बांगर ,राणा जाती।
6.कुइली गढ़, कुइली, सजवाण जाति ।
7. भरपूर गढ़ ,भरपूर, सजवाण जाति ।
8. कुजणी गढ़ ,कुजणी, सजवाण जाती।
9.सिलगढ़, सिलगढ़, सजवाण जाति ।
10.मुंगरा गढ़, रवॉई, रावत जाति ।
11. रैका गढ़, रैका रमोला जाति।
12.मौलया गढ़, रमोली, रमोला जाति ।
13. उप्पू गढ़, उदयपुर, चौहान जाति।
14.नाला गढ़, देहरादून,-।
15.सांकरी गढ़ -रवॉई -राणा जाति ।



16.रामीगढ़, शिमला, राणा जाति ।
17. बिराल्टा ,जौनपुर, रावत जाति।
18. चांदपुर गढ़ ,चांदपुर, सूर्यवंशी (राजा भानु प्रताप सिंह)।
19. चौंड़ागढ़ ,चांदपुर ,चौंदाल ।
20.तोपगढ़ ,चांदपुर, तोपाल जाति।
21.राणीगढ़,राणीगढ़ पट्टी,तोपाल जाती ।
22. श्री गुरु गढ़ ,सलाण परिहार जाती।
23. बधाण गढ़, बधाण, बधाणी जाति ।
24.लोहबाग गढ़, लोहबाग, नेगी जाति ।
25.दशोली गढ़, दशोली, -।
26.कुंडारागढ़,नागपुर,कुंडारी जाति ।
27.धौनागढ़, – ,धौनयाल जाति ।
28.रतन गढ़, कुजणी, धमादा जाति ।
29.एरासू गढ़, श्रीनगर के पास,- ।
30.इडिया गढ़, रवॉई बड़कोट, इडिया जाति ।



31.लंगूर गढ़, लंगूर पट्टी,- ।
32.बाग गढ़, गंगा सलाणा, बागूड़ी जाति ।
33.गढ़कोट गढ़, मल्ला ढांगू ,बगडवाल ।
34.गढ़ताग गढ़, टकनौर, भोटिया जाति ।
35.बनगढ़ गढ़, बनगढ़, – ।
36.भरदार गढ़, भरदार, – ।
37. चौंद कोटगढ़,चौंदकोट, चौंदकोट जाति ।
38.नयाल गढ़, कटूलसँयू, नया जाति ।
39.अजमीर गढ़, अजमेर पट्टी ,पयाल जाती।
40.कांडा गढ़, – ,रावत जाति ।
41.सावलीगढ़, सावली खाटली, – ।
42.बदलपुर गढ़, बदलपुर , – ।
43.संगेला गढ़, – ,संगेला जाति ।
44. गुजडू गढ़, गुजडू, – ।
45. जौट गढ़, देवपुरी, – ।
46. देवलगढ़ – देवलगढ़
47देवलगढ़- देवलगढ़
48.जौलपुर – देवलगढ़
49. चंपागढ़ देवलगढ़
50.दादराक्वार गढ़
51.भवना गढ़
52.लोदन गढ़

उत्तराखंड श्रीदेव सुमन बीएससी प्रीवियस एग्जाम पेपर के लिए यहां क्लिक करें। 


उत्तराखंड का सम्पूर्ण इतिहास | History of Uttarakhand से जुडी यह पोस्ट अगर आप को अच्छी लगी हो तो इसे शेयर करें साथ ही हमारे इंस्टाग्रामफेसबुक पेज व  यूट्यूब चैनल को भी सब्सक्राइब करें। साथ ही हमारी अन्य वेबसाइट को भी विजिट करें। 

1 thought on “उत्तराखंड का सम्पूर्ण इतिहास | History of Uttarakhand in Hindi”

  1. Pingback: बैजनाथ मंदिर | BaijNath Temple | WeGarhwali

  2. Pingback: UKSSSC यानि उत्तराखंड अधीनस्थ चयन आयोग | Uttarakhand Staff Selection Commission | WeGarhwali

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page

Scroll to Top