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उत्तराखंड का अष्टमी त्यौहार : कोणी, सट्टी और कुणजा से बनाते हैं देवी का स्वरुप और माँगा जाता है आशीर्वाद

उत्तराखंड का अष्टमी त्यौहार

उत्तराखंड और देवभूमि ये दोनों नाम समानार्थक समझें तो हैरानी नहीं होती। यहाँ हर जिले में हर गांव में बोली के साथ संस्कृतियों में भी अंतर देखने को मिलता है। वहीं देवी-देवताओं के पूजन का भी अलग-अलग रिवाज देखने को मिलता है। कुछ ऐसा ही रिवाज है उत्तराखंड के चमोली जिले में जहाँ हर साल माँ नंदा के पूजा के लिए नंदा अष्टमी में उनकी पाती बनाकर उनकी पूजा अर्चान की जाती है। तथा माता को‌ भेंट चढ़ाई जाती है। इसके अलावा कुमाऊं के अन्य जिलों में भी इस तरह का रिवाज देखने को मिलता है।

मान्यता है कि भादौं के सप्तमी के दिन माँ नंदा पति से रूठकर मायके आयी थी जिसे मनाने अष्टमी के दिन भगवान भोलेनाथ माँ नंदा को मनाने हिमालय आते हैं। कुमाऊं में माँ नंदा को गमरा देवी कहते हैं।  कुमाऊं और गढ़वाल के चमोली के क्षेत्रों में अष्टमी के दिन महेसर बना कर माँ गमरा देवी के बगल में रखा जाता है और उन्हें बिरुड़ भोग के लिए चढ़ाया जाता है। गांव में यह दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता। जीजा  भोलेनाथ और बहन नंदा के आगमन पर गांव में त्यौहार मनाया जाता है। तरह तरह के खेल, नृत्य और गायन से जीजा का स्वागत किया जाता है। जिससे गावं में उल्लास का माहौल रहता है। लिंक क्लिक करें।




 

उत्तराखंड का अष्टमी त्यौहार

उत्तराखंड का अष्टमी त्यौहार अद्भुत है। नंदा अष्टमी के इस दिन नहा-धोकर माँ नंदा की पाती बनाई जाती है। पाती बनाने के लिए कोणी (झंगोरा), सट्टी, मुंगरी, कुणजा से माँ नंदा का भेष बनाकर उन्हें लाल चुनरी से सजाया जाता है। और घर के किसी कोने में उन्हें भेंट चढ़ाकर पूजा अर्चना की जाती है।

इस दिन के लिए बिरुड़ (ब्योड़ा -गेंहू की अंकुरित दाने) को तीन दिन पहले पंचमी के दिन पानी में भिगा कर अंकुरित करने के लिए रखा जाता है। ताकि नंदा अष्टमी के दिन माता को भेंट चढ़ा सके। इसके साथ ही अखरोट, रोंट, पुला (गुलगला), मकई (मुंगरी) का भेंट पाती (माता के पुतला ) के अंदर रखकर माता को मायके पक्ष द्वारा भेंट चढ़ाई जाती है। और उन्हें खुशी – खुशी विदा किया जाता है।

तो वही घर- घर में बनाई गयी पाती को शाम को पानी के प्राकृतिक स्रोत या पूजनीय स्थानों पर रखा जाता है। और माता की भेंट को रखने वाला ही प्रसाद के रुप में माता के भेंट का सेवन करता है।   उत्तराखंड  हिमालय का यह क्षेत्र इसलिए विवधताओं से भरा है  और यहाँ की संस्कृति उतनी ही समृद्ध दिखती है।

 


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Deepak Bisht

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