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चंद्र सिंह राही – जीवन, करियर और उत्तराखंडी संगीत में उनका योगदान

चंद्र सिंह राही

 लोक गायक चंद्र सिंह राही | Chandra Singh Rahi 

 

नाम    चंद्र सिंह राही
जन्म 28 मार्च 1942
जन्म स्थान पौड़ी गढ़वाल , उत्तराखंड
पिता दिलबर सिंह
व्यवसाय  प्रमुख लोक गायक, बॉलएडर, संगीतकार, कवि, कहानी-टेलर और सांस्कृतिक संरक्षक

 

उत्तराखंड के सांस्कृतिक और पहाड़ी गीतों को जिन्होंने देश और दुनिया तक पहुंचाया उनमें से एक शख्श चंद्र सिंह रही भी हैं। गढ़वाली संगीत में उनके योगदान अवस्मरणीय है। चंद्र सिंह राही इन्होने संगीत की कोई ट्रेनिंग नहीं ली बल्कि संगीत तो इन्हे विरासत से मिला है और ये अनमोल विरासत को उन्होंने बखूबी संभाला भी। कुमाउँनी और गढ़वाली में गए उनके गीत आज भी थिरकने पर मजबूर कर देते हैं। 

चंद्र सिंह राही का प्रारंभिक जीवन 

चंद्र सिंह राही गढ़वाल के पौड़ी जिले में 28 मार्च 1942 को  एक गरीब परिवार में जन्मे थे। इनके अलावा इनके दो भाई थे। चंद्र सिंह राही 1957 में छोटी सी ही उम्र में दिल्ली चले गए थे। घर की आर्थिक स्थिति तंग होने के कारण वे रोजगार की तलाश गांव से दूर आ गए। दिल्ली में रहकर वे अक्सर उत्तराखंड के प्रति अपने प्रेम को गाने में पिरोने लगे। दिवंगत राही जी उत्तराखण्ड के ऐसे संगीतज्ञ थे जो हर दुर्लभ लोकवाद्य यंत्रों के जानकार थे। लोक वाद्यों को बजाने में भी उनको महारत हासिल थी। डौर, हुड़की, ढोल, दमाऊँ, शिणै को वे बड़ी कुशलता से बजा लेते थे। पौड़ी में गीत सीखने के बाद वे दिल्ली में रहने लगे। दिल्ली में होने वाले उत्तराखंडी सांस्कृतिक क्रियाकलापों में हिस्सा लेने लगे यही नहीं गढ़वाली फिल्म जगत में भी अपना योगदान दिया।

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चंद्र सिंह राही का करियर 

 

डांडी कांठी जन की तन च मनखी बदली ग्यायी

उत्तराखंडो रीति-रिवाज, चाल बदली ग्यायी

मोल माटू मनखी यखो उन्द बोगी ग्यायी ,

गौ गाला कुड़ी पुन्गडी, सब बांजा पोड़ी ग्यायी

पुंगड़्यों माँ गोणी, बांदर, सुन्गरों को राज

बीज को नसीब नि होणु द्वी माणी नाज

 

चंद्र सिंह राही दिल्ली में होने वाले उत्तराखंडी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे।  इस दौरान वे जो भी तनख्वाह कमाते उसका कुछ हिस्सा अपने लिखे गढ़वाली गीतों को रिकॉर्ड करने में खर्च करते। इनको एक बड़ा मौका दूरदर्शन के लिए फिल्मे बनाने का मिला और इसके बाद उन्होंने आकाशवाणी के लिए भी गाया। चन्द्र सिंह राही हमेशा निम्न तबके, मजदूर, गरीब, उपेक्षित और शोषित -लोगों के हितों के लिए समर्पित रहे। वो चाहते थे कि उनका पूरा जीवन उत्तराख्ंड के लिए काम करने में बीत जाए। विचारों में वे उत्तरकाशी के कॉमरेड कमलाराम नौटियाल के साथ भी जुड़े रहे और गले में हारमोनियम डाले मजदूरों की चेतना जगाने वाले गीत गाते हुए उनके साथ काफी घूमे थे। बाद में उन्होंने कम्युनिस्ट विचार धारा से अलग किया और हेमवती नंदन बहुगुणा के संपर्क में आने से कांग्रेस की ओर झुकाव हुआ। 

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चंद्र सिंह राही के गढ़वाली एवं कुमाउँनी गीत

उनके द्वारा गाये गए कुछ गीत ‘छाना बिलोरी झन दिया बोज्यू, लागनी बिलोरी का घामा…’, ‘गरुडा भरती कौसानी ट्रेनिंगा, देशा का लिजिया लडैं में मरुला…’, ‘बाटि लागी बराता चेली भैट डोलिमा…’, ‘सरग तरा जुनाली राता, को सुणलो तेरी-मेरी बाता…’, ‘काली गंगा को कालो पाणी…’, ‘हिल मा चांदी को बटना…’, ‘रणहाटा नि जाण गजै सिंहा…’, ‘मेरी चदरी छूटि पछिना…,’ ‘रामगंगा तरै दे भागी, धुरफाटा मैं आपफी तरूलों…,’ ‘पार का भिड़ा कौ छै घस्यारी…’, ‘कमला की बोई बना दे रोटी, मेरी गाड़ी ल्हे गै छ पीपलाकोटी…’, ‘पारे भिड़ै की बंसती छोरी रूमा-झुम…’, ‘ओ परुआ बोज्यू चप्पल कै ल्याछा यस…’, ‘ओ भिना कसिके जानूं द्वारहाटा…,’ ‘धारमक लालमणि दै खै जा पात मा…।’ हैं, यही नहीं कुमाउँनी और गढ़वाली संस्कृति के पारम्परिक गीत ‘न्यौली’, ‘छपेली’, ‘बाजूबंद’, झोड़े-झुमेलो’, ‘भगनोल’, ‘ऋतुरैण’ आदि लोकगीतों को भी अपने संगीत में पिरोने का काम किया।

 ये वही गीत हैं जिनके साथ हम बड़े हुए और इन्हें सुनकर ही हमने रामलीलाओं और स्कूल की बाल-सभाओं में खड़ा होना सीखा। यही लोकगीत हमारी चेतना के आधार रहे।




पुरस्कार और मान्यता 

  • मोहन उपरेती लोक संस्कृत कला सम्मान
  • डॉ शिवानंद नौटियाल स्मृति पुरस्कार
  • गध भारती गढ़वाल सभा सम्मान
  • मोनाल संस्थान, लखनऊ सम्मान

 

चंद्र सिंह राही को गढ़वाली व कुमाउनी संगीत में उनके योगदान के लिए कई सम्मान मिले। जिनमें उक्त पुरस्कार भी सम्मलित हैं। उनके द्वारा उत्तराखंडी संगीत को दिए गए बोल आज भी रीमेक के रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं। उनके द्वारा गाया गया “मेरो फ्वां बाघ रे रीमेक के बाद आज भी उत्तराखंड का लोकप्रिय और सबसे ज्यादा लोकप्रिय गीत है। 

 

निधन 

10 जनवरी 2016 को पहाड़ के यह अद्वितीय कलाकर हम सभी को छोड़कर चले गए। उनके द्वारा विरासत में छोड़े गए गीत और लोक शैलियों से हम सभी कुछ-न-कुछ सीखते रहें और उनकी विरासत को आगे बढाने में सहयोग करते रहें; राही के प्रति यही सच्ची श्रद्धा है ।

 

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Deepak Bisht

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