उत्तराखंड में हुए जन आंदोलन | Mass movement in Uttarakhand

उत्तराखंड में हुए जन आंदोलन:  जब कोई सत्ता तंत्र संगठित हो कर किसी व्यवस्था के द्वारा  किए जाने वाले शोषण व अन्याय के खिलाफ, संगठित और सुनियोजित  संघर्ष पैदा हो उसे आंदोलन कहते है । उत्तराखंड में समय-समय पर अनेक जन आंदोलन हुए है जिनका उद्देश्य दुनिया में हुए सभी आंदोलन की तरह ही  सत्ता या व्यवस्था में सुधार या परिवर्तन या एक नए राज्य पना था।
उत्तराखंड में हुए जन आंदोलन मूल रूप से प्रकति और पहाड़ों की विषम परिस्थियों से सम्बंधित थे, वहीं स्वतंत्रता से पहले सत्ता के खिलाफ भी अक्सर लोगों का आक्रोश देखने को मिलता है।

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उत्तराखंड में हुए प्रमुख जन आंदोलन नीचे दिए हैं इन आंदोलनों में राज्य निर्माण के लिए किये गए आंदोलनों के बारे में नहीं है। उत्तराखंड के राज्य आंदोलन के लिए अलग से पोस्ट की जाएगी। उत्तराखंड में हुए प्रमुख जन आंदोलन (Mass movement in Uttarakhand / Uttarakhand me Hue Jan Andolan)




उत्तराखंड में हुए जन आंदोलन | Mass movement in Uttarakhand

कुली बेगार आंदोलन

कुली बेगार प्रथा ब्रिटिश काल में प्रचलन ब्रिटिश की सहुलियत के लिए अभ्यास की जाने वाली कुप्रथा थी। ब्रिटिश काल में जब अंग्रेज एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते थे, तो रास्ते में पड़ने वाले सभी गॉवो के लोगों का यह दायित्व होता था  कि गॉव के व्यक्ति अंग्रेजों क सामान को एक  गांव से दूसरे गांव की सीमा तक लेकर जाएंगे ।इसके संबंध में रजिस्टर तैयार किए गए थे जो गॉव के मुखिया के पास रहते थे। इन रजिस्टरों को बेगार रजिस्टर कहा जाता था। सामान ले जाने वाले ग्रामीणों को उसके बदले कोई भी धनराशि  नहीं मिलती थी। 1921 में कुली-बेगार आन्दोलन  बागेश्वर में आम जनता द्वारा चलाया गया था एक अहिंसक आन्दोलन था। 13-14 जनवरी 1921 को बागेश्वर के उत्तरायणी मेला में बद्रीदत्त पाण्डेय तथा चिरंगी लाल शाह के  नेतृत्व में 40 हजार आंदोलनकारियो  द्वारा कुली बेगार ना देने की शपत ली गयी। पटवारियों ने कुली बेगार से सम्बंधित सभी रजिस्टर सरयू नदी में फेक दिए गये। यहीं से इस प्रथा का अंत हो गया।

 


डोला पालकी आंदोलन

डोला पालकी आंदोलन सामाजिक समानता के अधिकार को लिए किया गया था । इस आंदोलन का उद्देश्य शिल्पकार दूल्हा – दुल्हन को समाज के बाकी वर्गो की तरह ही पालकी या अब घोड़े में बैठने को हक प्राप्त हुआ । इससे पहले दूल्हा दुल्हन पैदल चलते थे । इस आंदोलन के जनक जयानंद भारती को माना जाता है जिन्होंने 1930 के आसपास इस आंदोलन की शुरुआत की । यह आंदोलन 20 वर्षों तक चला । आंदोलन के समाधान के लिए मुकदमा 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर किया गया जिसका निर्णय शिल्पकारों के पक्ष में आया जिसके पश्चात शिल्पकारों को पालकी में बैठने का अधिकार प्राप्त हुआ ।




तिलाड़ी या रवाई आंदोलन

यह स्वतंत्रता से पूर्व का आंदोलन है जब टिहरी गढ़वाल में नरेंद्र शाह का राज था। 1927-28 में टिहरी राज्य में वान कानून बनाया गया जिसके तहत ग्रामीणों के हीरो को सारे से नकारते हुए हुए उनके आवागमन के रास्ते , उनके खेत , करने के जंगल को वन कानूनों के अंतर्गत लाया गया । क्यों की पहाड़ी क्षेत्र कृषि पर निर्भर थे तो इससे सभी में काफी रोष उत्पन हो गया । इस कानून के खिलाफ 30  मई 1930  को जब  ग्रामीण विद्रोह कर  रहे थे  तो दीवान चक्रधर जुयाल के आज्ञा से सेना ने आंदोलनकारियों पर गोली चला दी  जिससे सेंकडो किसान शहीद हो गये थे। जिसे गढ़वाल का जलियांवाला बाग कहा जाता है । आज भी इस क्षेत्र में 30 मई को शहीद दिवस मनाया जाता हैं।

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टिहरी राज्य आंदोलन 

टिहरी में 1939 में श्री देव सुमन ,  दौलतरामनागेन्द्र सकलानी के अथक प्रयासों से प्रजा मंडल की स्थापना हुई और आंदोलन को विस्तार मिला । मई 1944 को श्री देव सुमन अनिश्चित काल के लिए हड़ताल पर चले गए और 25 जुलाई 1944 में उनकी मृत्यु 84 दिन के  हड़ताल में हो गई। भारत की आजादी (1947) के पश्चात सकलाना में राज्य के खिलाफ विद्रोह फुट पड़ा इसके पश्चात 1948  कीर्तिनगर आंदोलन हुआ और भोलूराम और नागेन्द्र शहीद हो गए। 1949 में राजा मानवेन्द्र शाह ने विलीनीकरण प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और 1 अगस्त 1949 से टिहरी सयुक्त उत्तर प्रदेश का जिला बन गया।


मैती आंदोलन 

मैती आंदोलन पर्यावरण सम्बन्धी आन्दोलन है जिसका जनक श्री कल्याण सिंह रावत को मना जाता हैं। उत्तराखंड में मैत शब्द का अर्थ होता है “मायका” और मैती  शब्द का अर्थ होते है मायके वाले। मैती आंदोलन में मायके वाले अपने लड़की की शादी के समय फेरे लेने के बाद वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पेड़ लगते है और उसे भी अपना मैती बनाते है । इस पेड़ की देख रेख मायके वाले करते है । ऐसा माना जाता है पेड़ जिस तरह फलेगा या हर भरा बना रहेगा उसी प्रकार लड़की का पारिवारिक जीवन भी समृद्ध बना रहेगा। इसी को देखते हुए मैती पूरे दिल से उस पेड़ का खयाल बेटी की तरह ही रखते है। 



आंदोलन की शुरुआत : इस पर्यावण आन्दोलन की शुरुआत  1994 में चमोली के ग्वालदम इंटर कॉलेज के जीव विज्ञान के प्रवक्ता श्री कल्याण सिंह रावत के द्वारा की गई थी । इसकी शुरुआत विद्यालय स्तर पर किया गया, फिर गांव समुचित प्रदेश को इस आंदोलन ने प्रकृति के प्रति प्रेरित किया ।

 आंदोलन की प्रेरणा :  जब श्री कल्याण सिंह रावत जी ने देखा पेड़ लगाने की बावजूद भी कुछ ही समय के पश्चात पेड़ बिना देख रेख़ के सूख जाते है तोह उन्हें ये समझ आया जब तक मनुष्य  पर्यावरण के साथ भावनात्मक रूप से संबंधित ना हो तब तक कोई भी वृक्षारोपण  सफल नहीं हो सकता है। और इसी को देखते हुए उन्होंने इसे भावनात्मक रूप दिया जिसमे मैती पेड़ की देख रख अपनी पुत्री की तरह करते है ।


चिपको आंदोलन

वनों का  70 के दशक में अंधाधुन कटाई (जिसमे बाज़ प्रमुख था ) को रोकने के लिए 23 वर्षीय विधवा महिला  गौरा देवी ने 1970 में एक आंदोलन की शुरूआत की । जिसमे सभी महिलाएं पेड़ो पर चिपक जाते है और पेड़ो को काटने नहीं दिया, उनका नारा था जान चली जाए पर पेड़ो को काटने नहीं देंगे। इससे ही आंदोलन को चिपको आंदोलन  नाम दिया गया ।इस आंदोलन का नारा  था  “क्या है इस जंगल का उपकार , मिटटी , पानी और बयार , ज़िंदा रहने के आधार ”।

     इस अनूठे आंदोलन ने ना सिर्फ देश के प्रति जागरूकता पैदा की बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नारीवादी पर्यावरणविद्  के रूप में एक नई पहचान दिलाई । इसे एक ओर नाम से भी पहचान मिली जो थी ईको फेमिनिज्म ( Eco Feminism )। सन  1987  में इस आंदोलन को सम्यक जीविका  पुरस्कार ( Right Livelihood award )  से सम्मानित किया गया । इस आंदोलन को शिखर पर पहुंचने का कार्य सुंदरलाल बहुगुणा ने लिया। जिसके लिए उन्हें 1981 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया परंतु उन्होंने ये ख कर सम्मान अस्वीकार कर दिया कि  “जब तक पेड़ो की कटाई जारी है, मै स्वयं को इस योग्य नहीं समझता हूं “।इस आंदोलन के समर्थन के लिए चमोली के चंडी प्रसाद भट्ट ने “हिमालय बचाओ देश बचाओ “ का नारा दिया जिसके लिए उन्हें 1981 में रेमन मैग्सेस पुरस्कार से सम्मानित किया गया । 

 


पाणी राखो आंदोलन

यहां पाणी का अर्थ जल से है। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण और जल स्रोतों को सुरक्षित रखना था ।सरकार द्वारा चलाई गई वन नीति के कारण वनो का अथाह कटान हो रहा था । इस वनोन्मूलन के कारण पर्यावरण संकट पैदा हो गया जिससे पेयजल की समस्या गहराने लगी । पौड़ी के उफरैंखाल में सच्चिदानंद भारती जो उरैफखाल के पर्यावरण विद्  एवं शिक्षक  द्वारा पाणी राखो आंदोलन की शुरूआत 1989 में की गई थी। सच्चिदानंद भारती ने “दुधतोली लोक विकास” संस्थान का गठन किया जिसके तहत अधिकारियों पर पेड़ ना काटने का दबाव बनाया गया और लाखों पेड़ लगाए गए। इस आंदोलन के तहत बंजर जमीन को फिर से हरा भरा करने का प्रयास किया गया और बरसात के पानी को जमा करने के लिए गड्डे बनाए गए।


कोटा खुर्द आंदोलन

यह आंदोलन सरकार द्वारा बनाए गए भूमि तथा वन कानूनों के विरोध में था । इस आंदोलन के तहत स्थानीय लोगों की भूमि को जंगलात की भूमि में तब्दील किया जा रहा था। इस भूमि सीलिंग कानून के खिलाफ यह आंदोलन चलाया गया जिसके तहत भूमि विहीन किसानों को भूमि वितरित की गई ।

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कनकटा बैल आंदोलन 

कनकटा बैल आन्दोलन की शुरुआत अल्मोड़ा के बडियार रेट (लमगड़ा) गाँव से हुई। यह आंदोलन अधिकारियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के खिलाफ किया गया था। अल्मोड़ा में एक बैल के ऋण लेने के लिए दो बार कान काटे गए | और दो बार ऋण लिया गया तथा दो बार बीमा की राशि हड़प कर ली गई | जिसके फलस्वरूप भ्रष्ट अधिकारियों के इस भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए इस बैल को राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में घुमाया गया तथा अधिकारियों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया गया।




रक्षासूत्र आंदोलन  

रक्षासूत्र आंदोलन के तहत काटने के लिए चिन्हित वक्षों पर रक्षासूत्र बांध कर उन्हे सुरक्षित रखने का संकल्प लिया गया जिससे चिन्हित होने के बावजूद भी वृक्ष सुरक्षित रहे । इस  आंदोलन की शुरूआत 1994 में टिहरी के भिलंगना क्षेत्र से हुई थी। इस आंदोलन का मूल कारण पहाड़ी के  ऊँचे स्थान पर वृक्षों के काटने से आरंभ   हुआ और लोगों ने काटने वाले सभी चिन्हित वृक्षों पर रक्षासूत्र बांधना शुरू कर दिया और उन्हें बचाने का संकल्प लिया ।इस के कारण आज भी रयाला जंगल के वृक्ष चिन्हित के बाद भी सुरक्षित हैं । इस आंदोलन का नारा था “ ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे, नदी ग्लेशियर टिके  रहेंगे , जंगल बचेगा देश बचेगा

 

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